- डॉ. नारायण तिवारी जगत्पालक भगवान श्री विष्णु के गुणानुवाद करने वाली पद्मपुराण में कथा है कि वैशम्पायन मुनि ने अपने सर्वज्ञ गुरु महामति वेदव्यास से पूछा- गुरुदेव नित्य पूर्व दिशा से उदित होकर जगत को अंधकारमुक्त करने वाले, आकाश चारी ये कौन हैं, क्योंकि मैं देखता हूँ कि देवता, ऋषि, सिद्धमुनि, चारण, दैत्य, राक्षस, ब्राह्मण और जनसामान्य सभी उनका पूजन-वंदन-आराधन करते हैं- इसका क्या प्रभाव और फल है।
वेदव्यास ने उत्तर दिया- वैशम्पायन, ये ब्रह्म तेज के साक्षात स्वरूप, स्वयं ब्रह्ममय समस्त सृष्टि के जीवनाधार भगवान सूर्यनारायण हैं। इनके पूजन-वंदन से सामान्य मनुष्य भी सहज ही धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करता है।
संज्ञाकांत भगवान सूर्य साक्षात देवता हैं। चर्मनेत्रों से भी बिना किसी कठिन तप या अनुष्ठान के, जिनके दर्शन किए जा सकते हैं। उनके आकाश मार्गीरथ में सात श्वेत अश्व हैं, एक ही पहिया है जिसमें बारह आरे हैं।
वर्षभर के बारह माहों में भगवान सूर्य अपने विभिन्न नामों, आदित्य स्वरूपों व संख्याओं में अपनी रश्मियों से आकाश में भ्रमण करते और तीनों लोकों को प्रकाशित और प्रभासित करते हैं। | | वैशम्पायन, ये ब्रह्म तेज के साक्षात स्वरूप, स्वयं ब्रह्ममय समस्त सृष्टि के जीवनाधार भगवान सूर्यनारायण हैं। इनके पूजन-वंदन से सामान्य मनुष्य भी सहज ही धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करता है। संज्ञाकांत भगवान सूर्य साक्षात देवता हैं। |
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* चैत्र- धाता नाम के आदित्य, आठ हजार रश्मियाँ।
* वैशाख- अर्यमानाम के आदित्य, दस हजार रश्मियाँ।
* ज्येष्ठ- मित्र नाम के आदित्य, सात हजार किरणें।
* आषाढ़- अरुण नाम के आदित्य, पाँच हजार किरणें।
* श्रावण- इन्द्र नाम के आदित्य, सात हजार किरणों से प्रकाशित।
* भाद्रपद मास- विवस्वान नाम के आदित्य, दस हजार रश्मियों से प्रकाशित होते हैं।
* आश्विन मास- पूषा नाम के आदित्य, स्वर्णमयी रथ में बिराजे छः हजार किरणों से आलोकित होते हैं।
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