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सूर्य : सृष्टि की आत्मा....
ये ग्रह मनुष्य का भरण-पोषण करता है एवं संकट के समय रक्षा करता है। धार्मिक प्रवृत्ति एवं शुभ मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी बृहस्पति से ही मिलती है, किंतु गुरु ग्रह को प्राण-शक्ति सूर्य से ही प्राप्त होती है। सूर्य व गुरु परस्पर मित्र भी हैं। सूर्य से अति निकट होने के कारण ही शुक्र, सूर्य की किरणों से दैदीप्यमान होता है और आनंद का एक स्रोत प्रवाहित करता है। सूर्य में वैराग्य एवं संभोग दोनों प्रकार की क्षमता प्रदान करने की शक्ति रहती है। सूर्य व शनि में पिता-पुत्र का संबंध है।

सूर्य की आकर्षित करने की शक्ति तथा शनि की प्रतिघाती शक्ति के परस्पर प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप ही सृष्टि में संतुलन स्थित रहता है। सूर्य को ग्रह मंडल का राजा माना गया है। अर्थात अन्य सभी ग्रहों का फल सूर्य की इच्छानुसार व प्रतिपादित नियमों के अनुसार होता है। अग्नि, जिसकी उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से मानी जाती है, सूर्य के प्रत्यधिदेवता हैं।

सूर्य पुरुष ग्रह और क्षत्रिय वर्ण में जन्मा कहा जाता है। सूर्य की किरणों की ज्वाला इतनी प्रखर थी कि इनकी पत्नी उसे सहन नहीं कर सकी। इसके फलस्वरूप 'छाया' को इनके पास रखकर स्वयं अपने पिता विश्वकर्मा के पास चली गई। सूर्य एवं छाया के संयोग से शनि, ताप्ती, विष्टि तथा सावणी मनु उत्पन्न हुए।

जब सूर्य को छाया की वास्तविकता का ज्ञान हुआ तब उन्होंने संज्ञा की खोज की। तब वह घोड़ी के रूप में ब्रह्मांड में भ्रमण कर रही थी। सूर्य ने भी अश्व का रूप धारण कर उससे संबंध स्थापित किया। इसके फलस्वरूप सूर्य ने यम, यमुना, दोनों अश्विनी कुमार तथा रैवत को जन्म दिया। वैवस्वत मनु भी इन्हीं के पुत्र हुए। महाभारत में भी सूर्य के संयोग से कर्ण के जन्म का वर्णन आता है। रामायण में राजा सुग्रीव को भी सूर्य पुत्र माना गया है।

सूर्य की किरणों की तीक्ष्णता को कम करने के लिए विश्वकर्मा ने इनकी किरणों से विष्णु का सुदर्शन चक्र्र, शिव का त्रिशूल, कुबेर का आयुध तथा कार्तिकेय का भाला आदि अनेक प्रकार के अस्त्र बनाए। इन वृत्तांतों से सूर्य की अपरिमित शक्ति, सृष्टि कम के लिए शक्तिशाली स्रोतों का प्रवाहित करना, देव हित तथा सृष्टि की अभिव्यक्ति के लिए अपने प्रभाव को सीमित रखना सूर्य के कुछ प्रमुख लक्षण प्रकट होते हैं।
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