आश्लेषा, ज्येष्ठा तथा रेवती नक्षत्र से कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशियाँ समाप्त होती हैं। यहाँ अंतिम 48 मिनट गंडांत हैं। अतः तीनों नक्षत्रों के अंतिम चरण का फल अशुभ है। वैसे भी फलकथन में लग्न संधि, भाव संधि, नक्षत्र संधि तथा राशि संधि समय में जन्म अशुभ माना गया है।
| | नक्षत्रों से संबंधित एक और भ्रांत धारणा है पंचक। यह मुहूर्त ज्योतिष की धारणा है। चंद्रमा का धनिष्ठा के अंतिम दो चरण से, शतभिषा पूर्वा एवं उत्तरा भाद्रप्रद तथा रेवती नक्षत्र से भ्रमण को पंचक नाम दिया गया है। |
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जहाँ तक चंद्रमा के बुध के नक्षत्रों में भ्रमण का प्रश्न है, वह स्वास्थ्य, चिंता व मानसिक कष्ट देता है। बुध का परम शत्रु चंद्रमा है। केतु मंगलवत होता है। चंद्रमा का केतु नक्षत्रों से भ्रमण धन व राजसुख की दृष्टि से उत्तम है। अतः गंडांत मूल को छोड़कर अन्य स्थिति में गंडमूल में भय खाने की आवश्यकता नहीं है।
संहिता ग्रंथों में मूलसंज्ञक नक्षत्रों का भयावह वर्णन है। इन ग्रंथों ने विभिन्न तरह से इनका फलकथन किया है। मूल नक्षत्र के निवास को स्वर्ग, पाताल व पृथ्वी लोक मानकर इनका फल कहा है। नक्षत्रों को पुरुषाकार मानकर विभिन्न अंगों के अनुसार समय विभाजन कर फल दिया गया है। कुछ संहिताओं ने नक्षत्र को वृक्ष मानकर समय विभाजन कर फल दिए हैं।
गंडांत मूल व वर्ष, मास, पक्ष, दिन, योग, करण तथा तिथि संधि के आधार पर भयावह फल दिए गए हैं। इन नक्षत्रों की शांति के भारी-भरकम शांति विधान भी प्रचलित हैं। वेदों में वर्णित देवराज इंद्र के ज्येष्ठा नक्षत्र की दुर्दशा जितनी फलितकारों ने की है, उतने ही परस्पर विरोधी फलकथन भी प्राप्त होते हैं। सत्य में कभी मतभेद नहीं होता, अतः इन नक्षत्रों के शास्त्रीकृत फलकथन में मतभेद क्या सिद्ध करता है? अब मुहूर्त ज्योतिष की विचित्रता देखें- मूल नक्षत्र में विवाह शुभ है, लेकिन ज्येष्ठा में नहीं। इसे क्या कहा जाएगा?
अगर गंडमूल की धारणा व उसके फल को स्वीकार कर लिया जाए तो मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु तथा मीन राशियाँ, केतु, बुध, रवि, चंद्रमा, मंगल तथा बृहस्पति ग्रह सदैव दूषित फल ही करेंगे? क्या यह संभव है? अतः गंडमूल से भय अनावश्यक है और भारी-भरकम शांति की व्यवस्था भी मिथ्या है।
नक्षत्रों से संबंधित एक और भ्रांत धारणा है पंचक। यह मुहूर्त ज्योतिष की धारणा है। चंद्रमा का धनिष्ठा के अंतिम दो चरण से, शतभिषा पूर्वा एवं उत्तरा भाद्रप्रद तथा रेवती नक्षत्र से भ्रमण को पंचक नाम दिया गया है। इन नक्षत्रों में शवदाह, भवन की छत डालना, लकड़ी-कंडे एकत्रित करना, यात्रा तथा अन्य शुभ कार्य वर्जित हैं।
यहाँ एक तथ्य रोचक है- पंचक में किया गया कार्य पाँच मर्तबा करना होता है। मुहूर्त ज्योतिष की विलक्षणता- पुष्य शुभ व स्थिर नक्षत्र है। सभी शुभ कार्य इसमें होते हैं। विवाह पुष्य नक्षत्र में नहीं होता है। पंचक अशुभ है, लेकिन विवाह होता है। शायद एक स्थिर विवाह की अपेक्षा पाँच विवाह करना ज्यादा सुखद है?
फलित व मुहूर्त ज्योतिष में बहुत सी भ्रांतियाँ व विरोधाभास मिलते हैं। गंडमूल व पंचक संज्ञक नक्षत्रों से भय खाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वैदिक साहित्य में सभी नक्षत्रों को शुभ कहा गया है।
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