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ज्योतिष सीखें
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- भगवान पुरोहित

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गुरु अन्य ग्रहों की अपेक्षा अधिक सौम्य, बलवान, कोमलवृतिक, ज्ञान-प्रदाता एवं शुभ ग्रह है। गुरु धन- मीन राशि का स्वामी (स्वग्रही) कर्क में उच्च का, मकर में नीच का, सूर्य-चंद्र-मंगल का मित्र, शनि-राहु-केतु में सम तथा बुध-शुक्र का शत्रु है। गुरु पाँचवें घर का कारक तथा अकेला लग्न का गुरु समस्त दोषकारक होता है।

जिस घर में बैठता है उसको बिगाड़ता है, परंतु जिस भाव को देखता है उसे लाभ पहुँचाता है। गुरु शरीर की शक्ति और ज्ञानकारक तथा सुख, समृद्धि, संतान देने वाला और धर्म-अध्यात्म में रुचि बढ़ाता है। शुभ भाव में निर्दोष गुरु राजयोग बनाता है। कहा गया है 'किं कुर्वति ग्रहा सर्वे भस्म केंद्रे बृहस्पति'- केंद्रस्थ गुरु सौ दोष दूर करता है, परंतु शत्रुग्रहयुक्त, अस्त तथा शत्रु क्षेत्र में न हो।

महिला की कुंडली में गुरु की भूमिका- गुरु महिलाओं का सौभाग्यवर्द्धक तथा संतानकारक ग्रह है। जन्म कुंडली में गुरु 1/2/4/5/11/12 में शुभ फल तथा 3/6/7/8/10 में अशुभ फल देता है। स्त्रियों की कुंडली में गुरु 7वें तथा 8वें भाव को अधिक प्रभावित करता है। मकर-कुंभ का अकेला गुरु पति-पत्नी के सुख में कमी लाता है। जलतत्वीय या कन्या राशि का सप्तम का गुरु होने पर पति-पत्नी के संबंध मधुर नहीं रहते।

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सप्तम में शुभ गुरु व मीन-धनु का होने पर विवाह विच्छेद की स्थिति बनाता है। गुरु शनि से प्रभावित होने पर विवाह में विलंब कराता है। राहु के साथ होने पर प्रेम विवाह की संभावना बनती है। महिला कुंडली में आठवें भाव में बलवान गुरु विवाहोपरांत भाग्योदय के साथ सुखी वैवाहिक जीवन के योग बनाता है। आठवें भाव में वृश्चिक या कुंभ का गुरु ससुराल पक्ष से मतभेद पैदा कराता है।

(1) गुरु यदि वृषभ-मिथुन राशि और कन्या लग्न में निर्बल-नीच-अस्त का हो तो वैवाहिक जीवन का नाश कराता है।
(2) 1/5/9/11 का गुरु बली होने पर जल्दी विवाह के योग बनाता है, परंतु वक्री, नीच, अस्त, अशुभ, कमजोर होने पर विलंब।
(3) मकर-कुंभ लग्न में सप्तम का गुरु भी वैवाहिक जीवन समाप्त कराता है।
(4) कारक गुरु मिथुन-कन्या का गुरु लग्न या सप्तम में हो तो अति शुभ होता है।
(5) अत्यंत प्रबल गुरु चंद्र-मंगल से उत्तम तालमेल होने पर वैवाहिक जीवन सफल होता है।
(6) मेष लग्न में विवाह में विलंब सप्तम का गुरु कराता है।
(7) कर्क-सिंह लग्न में 7/8 भाव का गुरु शुभ होने से वैवाहिक जीवन शुभ रहता है।
(8) वृश्चिक-धनु-मीन लग्न का गुरु वैवाहिक जीवन सुखी बनाता है तथा सहायक होता है। मीन राशि का गुरु सप्तम में होने पर वैवाहिक जीवन कष्टप्रद रहता है।

अनुभव से ज्ञात हुआ है कि गुरु का फल शुभ कम मिलता है। पुराणों में उच्च गुरु के अशुभ फल वर्णित है-
जन्म लग्ने गुरुश्चैव रामचंद्रो वनेगतः
तृतीय बलि पाताले, चतुर्थे हरिश्चंद्र,
षष्टे द्रोपदी चीरहरण च हंति रावणष्ट मे,
दशमे दुर्योधन हंति द्वादशे पांडु वनागतम्‌
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