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ज्योतिष का विज्ञान
- धनपाल जैन

ज्योतिष भी अन्य विज्ञानों की तरह एक विज्ञान है और उसका मूल उद्‍गम सृष्टि के गर्भ में छिपे तथ्यों को जानने की उत्सुकता में निहित है। आकाश-मंडल, निर्बाध गति से चलने वाले रात-दिन, और जन्म-मरण के चक्र और सूर्य, चन्द्र तथा तारागणों के प्रति मानव का कौतूहल अनादिकाल से रहता आया है।

इसी के परिणाम स्वरूप ज्योतिष की विद्या का प्रादुर्भाव हुआ और उसके शास्त्र को विभिन्न ग्रहों और काल का बोध कराने वाले शास्त्र के रूप में स्थापित किया गया। ज्योतिषशास्त्र को वेदों में भी समुचित प्रतिष्ठा प्रदान की गई थी। और यह तथ्य कतिपय व्यक्तियों की इस धारणा को सर्वथा निर्मूल सिद्ध करता है कि यह विज्ञान भारत में विदेशों से आयातित हुआ था।

ज्योतिष का विज्ञान वस्तुतः अपने आप में इतना सशक्त और भरपूर है कि उसके प्रबल विरोधी भी उसके वैज्ञानिक पहलुओं की अवहेलना नहीं कर सकते। ज्योतिष विज्ञान के अन्तर्गत आने वाले ग्रह स्वयं किसी को सुख अथवा दुःख प्रदान नहीं करते। हाँ, उनका प्रभाव सृष्टि के अणु-परमाणुओं पर निरंतर पड़ता रहता है और उससे यहाँ का प्राणी जगत भी प्रभावित होता है। उदाहरण स्वरूप कमल का पुष्प सूर्य की प्रथम किरण पाते ही खिल उठता है और फिर सूर्यास्त होने के साथ ही उसकी पंखुड़ियाँ बंद हो जाती हैं। इसे सूर्य की अपनी विशेषता नहीं कहा जाएगा, बल्कि उन दोनों के मिलन के फलस्वरूप ही इस प्रकार की प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है।

कोई भी विज्ञान अपने आप में संपूर्ण नहीं होता। उसकी कुछ विशेषताएँ होती हैं और कुछ खामियाँ। इसी तरह ज्योतिष विज्ञान को भी सर्वथा पूर्ण और निष्कलंक कहना कठिन है। इसका मुख्य कारण यह है कि इस विज्ञान के गणित को अनादिकाल से हमारे पूर्वजों ने गोपनीय बनाए रखने की चेष्टा की और तत्संबंध में जो ज्ञान जिसके पास था वह उसके जीवन के साथ ही समाप्त होता चला गया।

आज भी इस विज्ञान को फलने-फूलने के लिए न उस तरह का परिवेश मिल रहा है जो उसके विकास और विस्तार के लिए अपेक्षित है, और न वह वातावरण जिसके सहारे वह अपने को पुष्पित-पल्लवित करने में समर्थ हो सके। अपनी तमाम कमियों के बावजूद मनुष्य के जीवन में ज्योतिष-विज्ञान का सर्वोपरि स्थान है। यह बात भी असंदिग्ध है कि समग्र विश्व इस विज्ञान की सहायता से अपनी विभिन्न समस्याओं के निराकरण में असामान्य रूप से सफल हो सकता है।
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