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शुभ फलदायी गुरु-पुष्य योग
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पंचांग के अंग में नक्षत्र का स्थान द्वितीय स्थान पर है। सर्वाधिक गति से गमन करने वाले चंद्रमा की स्थिति के स्थान को इंगित करते हैं जो कि मन व धन के अधिष्ठाता हैं। हर नक्षत्र में इनकी उपस्थिति विभिन्ना प्रकार के कार्यों की प्रकृति व क्षेत्र को निर्धारण करती है। इनके अनुसार किए गए कार्यों में सफलता की मात्रा अधिकतम होने के कारण उन्हें मुहूर्त के नाम से जाना जाता है।

मुहूर्त का ज्योतिष शास्त्र में स्थान एवं जनसामान्य में इसकी महत्ता विशिष्ट है। कार्तिक अमावस्या के पूर्व आने वाले पुष्य नक्षत्र को शुभतम माना गया है। जब यह नक्षत्र सोमवार, गुरुवार या रविवार को आता है, तो एक विशेष वार नक्षत्र योग निर्मित होता है। जिसका संधिकाल में सभी प्रकार का शुभफल सुनिश्चित हो जाता है। गुरुवार को इस नक्षत्र के पड़ने से गुरु पुष्य नामक योग का सृजन होता है। यह क्षण वर्ष में कभी-कभी आता है।

इस वर्ष 1 नवंबर 2007 को यह योग पड़ रहा है। 1 नवंबर 07 को प्रातः 5 बजकर 28 मि. 32 सेकंड से 2 नवंबर को प्रातः 5 बजकर 42 मिनट 14 सेकंड तक यह नक्षत्र रहेगा। इसमें गुरु पुष्य योग स्थानीय सूर्योदय से आरंभ होगा। नक्षत्र के राजा पुष्य के स्वामी शनि है। इसलिए इसमें किए गए पुण्य कार्य अथवा आर्थिक कार्य स्थायी रहते हैं।

इसलिए इन कार्यों को इस अवधि में प्रारंभ करना श्रेष्ठतम बताया है। व्यापार का मूल आधार हिसाब-किताब जो कि बही, डायरी, सीडी, फ्लापी, कॉपी, रजिस्टर, कम्प्यूटर में रखा जाता है, को इस दिन क्रय करने से वर्षपर्यंत व्यापार में प्रगति व विवादहीनता की स्थिति बनती है।

अपनी कुल परंपरा के अनुसार गुरुवार के इस योग में बही को क्रय करना चाहिए। उसके क्रय करते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

* उसे स्नानादि से शुद्ध पवित्र होकर ही लेने जाना चाहिए।
* वस्त्र नवीन या धुले हुए पारंपरिक पहनना चाहिए।
* गुरुदेव, गणेशजी, लक्ष्मी व सरस्वतीजी का पूजन करना चाहिए।
* जो भी सामग्री ले वह कटी-फटी या दाग-धब्बे रहित होना चाहिए।
* बही आदि उधार नहीं लाना चाहिए।
* बही लाने जाते-आते समय मुँह नहीं झूठा करना चाहिए।
* पूरी प्रक्रिया में इष्टदेव का स्मरण रखना चाहिए।
* सामग्री लाकर उसे पवित्र स्थान पर रखना चाहिए।
* इस सामग्री में सरस्वतीदेवी का विशेष स्मरण करना चाहिए।
* यदि हो सके तो सामग्री लेने जाने के पूर्व देव दर्शन अवश्य करना चाहिए।

बही के अतिरिक्त इस दिन वस्त्र, आभूषण, रत्न, पात्र का क्रय करना भी शुभ फलदायी रहता है।
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