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- पं. अशोक पंवार 'मयंक'

Kumbh Lagn
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कुंभ लग्न स्थिर लग्न है। इसका स्वामी शनि है। इसकी एक राशि द्वादश भाव में मकर राशि है। कुंभ लग्न में धन की स्थिति जानने हेतु हमें एकादश भाव यानी लाभ भाव, आय भाव को जानना होगा, वहीं द्वितीय भाव धन की बचत का भी होता है। इससे बैंक बैलेंस या धन की बचत के बारे में जाना जाता है। कुंभ लग्न में एकादश व द्वितीय भाव का स्वामी अकेला गुरु होता। गुरु धर्म, न्याय, पृथक्करण का कारक ग्रह है।

गुरु की स्थिति यदि षष्ठ भाव में उच्च की होगी तो वह जातक शत्रु से भी धन लाभ पाने वाला होगा। उसे अपने मामा-नाना के यहाँ से भी लाभजनक स्थिति रहेगी। ऐसा जातक पशुधन से भी लाभ पाता है एवं यहाँ पर स्थिति गुरु की पंचम दृष्टि दशम भाव पर वृश्चिक राशि पर पड़ती है। यदि मंगल की स्थिति द्वादश भाव में हो तो उच्च का होने से जातक अपने पराक्रम के बल पर व्यापार से तथा विदेश से धन लाभ पाने वाला होता है एवं ऐसा जातक पराक्रमी मित्रों से भी लाभ पाता है।

गुरु यदि सप्तम भाव में सिंह राशि का हो तो ऐसा जातक अपनी पत्नी से धनलाभ पाता है एवं दैनिक व्यवसाय जैसे किराना, वस्त्र आदि से लाभ पाने वाला होता है, ऐसे जातक की पत्नी सर्विस में भी हो सकती है। गुरु की नवम मित्र दृष्टि पराक्रम तृतीय भाव पर पड़ने से ऐसे जातक को भाइयों, मित्रों व साझेदारी के व्यापार से भी लाभ मिलता है। ऐसा जातक संचार माध्यम से भी लाभ पाने वाला होता है।

गुरु की नवम मित्र दृष्टि पराक्रम तृतीय भाव पर पड़ने से ऐसे जातक को भाइयों, मित्रों व साझेदारी के व्यापार से भी लाभ मिलता है। ऐसा जातक संचार माध्यम से भी लाभ पाने वाला होता है। गुरु की पंचम भाव में स्थिति होने से पंचम दृष्टि नवम भाव पर पड़ेगी। यदि नवम भाव का स्वामी शुक्र जहाँ होगा, उस राशि से संबंधित व्यवसाय में भी धनलाभ पाने वाला हो सकता है। गुरु-शुक्र की युति उस जातक को बैंककर्मी, चिकित्सक भी बना सकती है। ऐसा जातक स्त्रियों से संबंधित वस्त्रों के व्यवसाय में धनलाभ दिलाता है।

गुरु की बुध के साथ युति उसे विद्या, लेखन, व्यापार में सेल्समैनशिप से भी धनलाभ दिलाती है। पंचम में गुरु पुत्रों से भी धनलाभ दिलाती है। ऐसे जातकों के पुत्र भाग्यशाली, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ भी होते हैं। आय का साधन मनोरंजन से भी हो सकता है। गुरु जहाँ सप्तम दृष्टि आय भाव पर डालता है व आयेश का विद्याभाव में होना ही बताता है कि ऐसा जातक व्यापारी या शिक्षक भी हो सकता है। गुरु की नवम दृष्टि लग्न पर शत्रु दृष्टि पड़ने से उस जातक को थोड़ी कठिनाइयों के बाद ही सफलता दिलाती है।

गुरु का तृतीय भाव में होना, उस जातक को अत्यंत पराक्रम के बल पर व संचार माध्यम से धनलाभ दिलाता है। ऐसा जातक दूरसंचार या दूरदर्शन में भी सर्विस करने वाला होता है या पत्रवाहक भी हो सकता है। गुरु की पंचम दृष्टि पत्नी को धर्मपरायण बनाने के साथ पत्नी के नाम से किए गए व्यापार में भी सफलता दिलाती है। ऐसा जातक स्टेशनरी, किराना, कपड़ों के व्यवसाय से भी लाभान्वित होता है। ऐसे जातक के शत्रु नहीं होते। गुरु यदि दशम भाव में हो तो ऐसा जातक राजनीति में भी सफल होता है। यदि मंगल साथ हुआ तो ऐसा जातक बड़े उद्योगों का मालिक भी हो सकता है। ऐसा जातक टेक्सटाइल मिल डालकर भी लाभ पाने वाला होता है।

यदि गुरु के साथ चंद्र हो और उसकी स्थिति सप्तम भाव में हो तो ऐसे जातक की स्त्री उच्च पदों पर पहुँचने वाली राजनीतिज्ञ, प्रोफेसर भी होती है। यह जातक अपनी पत्नी के बल पर धनी होता है। गुरु की अष्टम भाव में युति आय को कुटुंब पर खर्च करवाती है। गुरु यदि द्वितीय भाव में हो और कुंडली स्त्री की हो तो वह स्त्री अखंड सौभाग्यवती होती है एवं कुटुंब की प्यारी तथा धनी होती है। गुरु की अनुकूल स्थिति द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम भाव व दशम भाव में अनुकूल होगी।