पुरान मिथ्‍या या सच, जानिए

में भेद है। इतिहास और पुराण में भी भेद है। वेद और स्मृतियों और संहिताओं में भी भेद हैं। हिंदुओं को यह अच्छे से जान लेना चाहिए कि पुराण, रामायण, महाभारत, स्मृतियां, संहिताएं आदि सभी धर्मग्रंथ नहीं है। धर्मग्रंथ तो सिर्फ वेद ही है।
जो लोग मतांध या अंधविश्वासी हैं वे पुराण को भ्रमपूर्ण या मिथ्‍या नहीं मानते और जो अति तर्कशील हैं उनके लिए पुराण भ्रम और झूठ का एक पुलिंदा मात्र है किंतु जो शोधार्थी हैं वे पुराणों में इतिहास और वेद की बातें निकालकर अलग कर लेते हैं।
 
पुराण का योगदान : यदि आपको पांच-दस हजार साल का ही लेखा-जोखा लिखना हो और वह भी सिर्फ राजाओं और युद्धमें रत लोगों की बेवकूफियां तो कोई दिक्कत वाली बात नहीं, लेकिन यदि आपको लाखों सालों को कुछ ही पन्नों पर समेटना हो और वह भी इस तरह कि कोई भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम छूट न जाए तो निश्चित ही यह आपके लिए कठिन कार्य होगा। पुराणों ने वेदों के ज्ञान को कथा में पिरोया।
 
पुराण का अर्थ : पुराण का अर्थ होता है सबसे पुरातन या प्राचीन। पुराण में हजारों नहीं लाखों साल की परम्परा, इतिहास, संस्कृति और वैदिक ज्ञान को समेटने का प्रयास किया गया।
 
अनुयायियों का पुराण : शैव पंथियों ने शिव को आधार बनाकर, वैष्णव पंथियों ने विष्णु को आधार बनाकर, शाक्तों ने शक्ति को आधार बनाकर, एकेश्वरवादियों ने निराकार ईश्वर को आधार बनाकर और कृष्ण भक्तों ने कृष्ण को आधार बनाकर सृष्टि उत्पत्ति, मानव इतिहास, परम्परा, धर्म और दर्शन का विस्तार किया। इसीलिए सब कुछ भ्रमपूर्ण या कहें कि होच-पोच लगता है। फिर भी वेद व्यास कहते हैं कि जहाँ ऐसा लगता है वहाँ वेद की बातों को ही प्रमाण मानना चाहिए।
 
वेदों और पुराणों के हजारों पन्ने तो काल-कवलित हो गए हैं और जितने पन्ने समय खा गया उससे कहीं अधिक तो श्रुति और स्मृति की बातें विस्मृत हो गई हैं, फिर भी जो बचा है उसे जब संग्रहित किया गया तो निश्चित ही वह क्रमबद्ध नहीं रहा सब कुछ होच-पोच था। परंतु इतने के ही अर्थ निकाल लिए तो जो छूट गया है उसे इतने से ही पकड़ा जा सकता है।
 
आज के पाश्चात्य नजरिए से प्रभावित लोगों को पुराण की कोई समझ नहीं है। आज हवा का रुख है इतिहास की ओर। लोग यह नहीं जानते कि जीवन रहस्यमय है जिसकी परतों पर परतें हैं। यदि वर्तमान धार्मिकों के पास थोड़ी-सी वैज्ञानिक समझ होती तो वे पुराण में छिपे इतिहास और विज्ञान को पकड़ना जानते। लेकिन पोथी-पंडितों को कथाएँ बाँचने से फुरसत मिले तब तो कहीं वे पुराण को इतिहास करने में लगेंगे। तब तो कहीं उन पर शोध किया जाएगा।
 
पुराण का अर्थ है इतिहास का सार, निचोड़ और इतिहास का अर्थ है जो घटनाक्रम हुआ उसका तथ्‍यपरक विस्तृत ब्योरा। जरूरत है कि हम पुराण की कथाओं को समझें और उन्हें इतिहास अनुसार लिखें। कब तक पुराण की कथाओं को उसी रूप में सुनाया जाएगा जिस रूप में वे काल्पनिक लगती हैं। जरूरत है कि उसके आसपास जमी धूल को झाड़ा जाए।
 
यह भी जानें : हिंदुओं के मुख्‍यत: चार इतिहास ग्रंथ माने गए हैं- (1) रामायण (2) महाभारत, (3) स्मृति और (4) पुराण। पौराणिक कथा का अर्थ हैं कि ऐसे घटनाएं जो घटी हैं लेकिन इसका हमारे पार कोई ठोस ब्योरा नहीं है बस यह हमने अपनी परंपरा से जाना।
 
रामायण और महाभारत की कहानियों को पौराणिक कथाएं कहना अनुचित है, क्योंकि इसका हमारे पास ठोस सबूत है और इसमें घटनाओं को पुराणिक कथाओं के स्टाइल में लिखा भी नहीं गया है। बहुत से लेखकों और संतों को यह कहते सुना गया है कि 'रामायण और महाभारत की पौराणिक कथाएं'। ऐसे लोग हिन्दू धर्म के दुश्मन हैं।
 
उक्त दोनों इतिहास ग्रंथ से पूर्व और समकाल के इतिहास और उक्त काल के विस्तृत घटनाक्रम तथा वेदों के ज्ञान को पुराणों में समेटकर घटना से जुड़े स्थानों आदि का महिमा मंडन किया गया है, इसीलिए पुराण इतिहास भी है और वेदों की मिथकीय व्याख्या भी।
 
पुराणों के नाम : अग्नि, भागवत, भविष्य, ब्रह्म, ब्रह्मांड, गरुड़, कूर्म, लिंग, मार्कंडेय, मत्स्य, नारद, पद्म, शिव, स्कंद, ब्रह्मवैवर्त, वामन, वराह, विष्णु आदि। उक्त अट्ठारह के अट्ठारह ही उप-पुराण हैं। वेद और पुराण में भेद है। इतिहास और पुराण में भी भेद है। वेद और स्मृतियों और संहिताओं में भी भेद हैं। हिंदुओं को यह अच्छे से जान लेना चाहिए कि पुराण, रामायण, महाभारत, स्मृतियां, संहिताएं आदि सभी धर्मग्रंथ नहीं है। धर्मग्रंथ तो सिर्फ वेद ही है।
 
जो लोग मतांध या अंधविश्वासी हैं वे पुराण को भ्रमपूर्ण या मिथ्‍या नहीं मानते और जो अति तर्कशील हैं उनके लिए पुराण भ्रम और झूठ का एक पुलिंदा मात्र है किंतु जो शोधार्थी हैं वे पुराणों में इतिहास और वेद की बातें निकालकर अलग कर लेते हैं।
 
पुराण का योगदान : यदि आपको पांच-दस हजार साल का ही लेखा-जोखा लिखना हो और वह भी सिर्फ राजाओं और युद्ध में रत लोगों की बेवकूफियां तो कोई दिक्कत वाली बात नहीं, लेकिन यदि आपको लाखों सालों को कुछ ही पन्नों पर समेटना हो और वह भी इस तरह कि कोई भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम छूट न जाए तो निश्चित ही यह आपके लिए कठिन कार्य होगा। पुराणों ने वेदों के ज्ञान को कथा में पिरोया।
 
पुराण का अर्थ : पुराण का अर्थ होता है सबसे पुरातन या प्राचीन। पुराण में हजारों नहीं लाखों साल की परम्परा, इतिहास, संस्कृति और वैदिक ज्ञान को समेटने का प्रयास किया गया।
 
अनुयायियों का पुराण : शैव पंथियों ने शिव को आधार बनाकर, वैष्णव पंथियों ने विष्णु को आधार बनाकर, शाक्तों ने शक्ति को आधार बनाकर, एकेश्वरवादियों ने निराकार ईश्वर को आधार बनाकर और कृष्ण भक्तों ने कृष्ण को आधार बनाकर सृष्टि उत्पत्ति, मानव इतिहास, परम्परा, धर्म और दर्शन का विस्तार किया। इसीलिए सब कुछ भ्रमपूर्ण या कहें कि होच-पोच लगता है। फिर भी वेद व्यास कहते हैं कि जहाँ ऐसा लगता है वहाँ वेद की बातों को ही प्रमाण मानना चाहिए।
 
वेदों और पुराणों के हजारों पन्ने तो काल-कवलित हो गए हैं और जितने पन्ने समय खा गया उससे कहीं अधिक तो श्रुति और स्मृति की बातें विस्मृत हो गई हैं, फिर भी जो बचा है उसे जब संग्रहित किया गया तो निश्चित ही वह क्रमबद्ध नहीं रहा सब कुछ होच-पोच था। परंतु इतने के ही अर्थ निकाल लिए तो जो छूट गया है उसे इतने से ही पकड़ा जा सकता है।
 
आज के पाश्चात्य नजरिए से प्रभावित लोगों को पुराण की कोई समझ नहीं है। आज हवा का रुख है इतिहास की ओर। लोग यह नहीं जानते कि जीवन रहस्यमय है जिसकी परतों पर परतें हैं। यदि वर्तमान धार्मिकों के पास थोड़ी-सी वैज्ञानिक समझ होती तो वे पुराण में छिपे इतिहास और विज्ञान को पकड़ना जानते। लेकिन पोथी-पंडितों को कथाएँ बाँचने से फुरसत मिले तब तो कहीं वे पुराण को इतिहास करने में लगेंगे। तब तो कहीं उन पर शोध किया जाएगा।
 
पुराण का अर्थ है इतिहास का सार, निचोड़ और इतिहास का अर्थ है जो घटनाक्रम हुआ उसका तथ्‍यपरक विस्तृत ब्योरा। जरूरत है कि हम पुराण की कथाओं को समझें और उन्हें इतिहास अनुसार लिखें। कब तक पुराण की कथाओं को उसी रूप में सुनाया जाएगा जिस रूप में वे काल्पनिक लगती हैं। जरूरत है कि उसके आसपास जमी धूल को झाड़ा जाए।
 
यह भी जानें : हिंदुओं के मुख्‍यत: चार इतिहास ग्रंथ माने गए हैं- (1) रामायण (2) महाभारत, (3) स्मृति और (4) पुराण। पौराणिक कथा का अर्थ हैं कि ऐसे घटनाएं जो घटी हैं लेकिन इसका हमारे पार कोई ठोस ब्योरा नहीं है बस यह हमने अपनी परंपरा से जाना।
 
रामायण और महाभारत की कहानियों को पौराणिक कथाएं कहना अनुचित है, क्योंकि इसका हमारे पास ठोस सबूत है और इसमें घटनाओं को पुराणिक कथाओं के स्टाइल में लिखा भी नहीं गया है। बहुत से लेखकों और संतों को यह कहते सुना गया है कि 'रामायण और महाभारत की पौराणिक कथाएं'। ऐसे लोग हिन्दू धर्म के दुश्मन हैं।
 
उक्त दोनों इतिहास ग्रंथ से पूर्व और समकाल के इतिहास और उक्त काल के विस्तृत घटनाक्रम तथा वेदों के ज्ञान को पुराणों में समेटकर घटना से जुड़े स्थानों आदि का महिमा मंडन किया गया है, इसीलिए पुराण इतिहास भी है और वेदों की मिथकीय व्याख्या भी।
 
पुराणों के नाम : अग्नि, भागवत, भविष्य, ब्रह्म, ब्रह्मांड, गरुड़, कूर्म, लिंग, मार्कंडेय, मत्स्य, नारद, पद्म, शिव, स्कंद, ब्रह्मवैवर्त, वामन, वराह, विष्णु आदि। उक्त अट्ठारह के अट्ठारह ही उप-पुराण हैं।
-अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'
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