फादर्स डे : तपती धूप में उन्हें छांव बनते देखा है


कहते हैं लोग, मां का दिल पिघलता है... पर पिता कभी बदलते नहीं। लेकिन पिता को मैंने बदलते देखा है। संतान के जन्म से ही पति से पिता हो चुके उस व्यक्तित्व को कदम-दर-कदम मैंने चलते देखा है। उनके इस किरदार को परत-दर-परत उभरते देखा है।
 
पिता और संतान का रिश्ता, तभी से कल्पनाओं और भावनाओं की छांव में पल्लवित होने लगता है, जब से मां के गर्भ में हमारे अस्तित्व के होने की आहट सुनाई देती है। मां शारीरिक और मानसिक रूप से जुड़ती है तो पिता भी अपनी आत्मीयता की छांव उड़ेल देता है, भावी सपनों की जमीन पर।
 
पिता बदलता है हर पल, अपनी संतान के साथ...बढ़ता है हर-पल उसकी उम्र के साथ...और बदलता है उसकी जरूरतों के साथ-साथ...। बचपन की खेलती यादों के बीच ही जरा जाकर देख लीजिए...क्या पिता, आपके साथ सिर्फ एक पिता थे? याद आ जाएंगे वो तमाम उछलते, कूदते, मस्ती में खिलखिलाते लम्हें, जो पापा के साथ मिलकर की शैतानियों में आज भी महक रहे हैं। जब मम्मी की चिंताओं के बीच, हमारी मस्ती भरी हरकतों पर रोक लग जाती...तो पापा से सिर्फ ग्रीन सिग्नल ही नहीं मिलता...बल्कि पापा के साथ ही चलने लगती मस्ती की छुक-छुक गाड़ी। बचपन में बच्चे थे पापा भी हमारे साथ, चिंता की लकीरों के बीच भी।

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