राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद कभी जीत न सके चुनाव!

Author अवनीश कुमार| Last Updated: मंगलवार, 20 जून 2017 (01:21 IST)
लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी के द्वारा राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में को चुने जाने के बाद से व कानपुर देहात में मानो खुशी की लहर दौड़ उठी है और ऐसा होना लाजमी है क्योंकि रामनाथ कोविंद का कानपुर नगर व देहात से बहुत गहरा नाता रहा है। जहां एक तरफ उनका जन्म कानपुर देहात के डेरापुर तहसील के झींझक कस्बे के एक छोटे से गांव परौख में हुआ तो वही दूसरी तरफ उनका पूरा समय उनका कानपुर नगर में गुजरा।
कोविंद के राजनैतिक जीवन की शुरुआत भी कानपुर से ही हुई लेकिन एक ऐसा सच है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। इस सच को सोचकर कहीं न कहीं राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद भी परेशान हो जाते थे। ऐसा हम नहीं कानपुर में रहने वाले उनके वह साथी कार्यकर्ता कह रहे हैं, जिन्होंने राजनीतिक सफर में उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चले हैं।

अब आप सोच रहे होंगे ऐसा कौनसा सच है, जिसे सोच खुद राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद विचलित हो जाते हैं? आइए आपको हम बताते हैं वह सच क्या हैं? राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद कभी भी जीतकर जनता का प्रतिनिधित्व करने का मौका नहीं मिला है। इसे लेकर कई बार उनके साथ चुनाव में कंधे से कंधा मिलाकर रहने वाले साथी कार्यकर्ताओं से खुद रामनाथ कोविंद ने इस दर्द को बयां किया था।

उनको जानने वाले साथी कार्यकर्ता कहते हैं कि वह सुलझे हुए और सरल व्यक्ति हैं। उनसे मिलना बहुत आसान था और जनता के लिए वह हमेशा उनके सुख-दु:ख में तत्पर रहते थे लेकिन फिर भी चुनावी नतीजे जब आए, तब चौंकाने वाले आए और हमारे नेता को सिर्फ निराशा ही मिली लेकिन फिर भी उन्होंने हार को भी खुशी-खुशी स्वीकार लिया था और जनता की सेवा में लगे रहते थे

उनके पास जो भी आता था उसकी समस्या के निदान के लिए कभी पीछे नहीं हटते थे। आइए हम आपको बताते हैं कि वह कौन-कौन सी सीटें थी, जहां से राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी कोविंद को हार का सामना करना पड़ा था। सबसे पहले भारतीय जनता पार्टी ने रामनाथ कोविंद को साल 1990 में घाटमपुर लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा। कोविंद ने चुनाव जीतने के लिए रात दिन मेहनत की और आम जनता के करीब जाने का प्रयास किया लेकिन जब चुनाव नतीजा आया तो उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

लेकिन कहीं ना कहीं भारतीय जनता पार्टी ने उन पर फिर विश्वास किया और साल 2007 में उन्हें प्रदेश की राजनीति में सक्रिय करने के लिए कानपुर देहात की भोगनीपुर सीट से चुनाव लड़ाया गया और कोविंद पार्टी के सम्मान को बचाने के लिए डटकर चुनाव लड़ा। जनता के बीच गए सुख-दु:ख को जाना और समझा लेकिन जब चुनाव का नतीजा आया तो बेहद चौंकाने वाला था क्योंकि फिर एक बार उनकी किस्मत ने उन्हें धोखा दे दिया था और उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।
हालांकि भारतीय जनता पार्टी ने 1994 में कोविंद उत्तर प्रदेश से पहली बार राज्यसभा के लिए सांसद चुने गए। वह 12 साल तक राज्यसभा सांसद रहे। इस दौरान उन्होंने शिक्षा से जुड़े कई मुद्दों को उठाया वह कई संसदीय समितियों के सदस्य भी रहे हैं। बाद में कोविंद को 8 अगस्‍त 2015 को बिहार का राज्यपाल नियुक्‍त किया गया। भारतीय जनता पार्टी में रामनाथ कोविंद की पहचान एक दलित चेहरे के रूप में रही है। छात्र जीवन में कोविंद ने अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं के लिए काम किया।

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