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हाड़कंपा देने वाली सर्दी के बावजूद खुश हैं एलओसी पर तैनात जवान

सुरेश डुग्गर| पुनः संशोधित शनिवार, 14 जनवरी 2017 (20:04 IST)
जम्मू। कश्मीर और लद्दाख क्षेत्रों के कई स्थानों पर पारा नीचे चले जाने के कारण रात के में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। श्रीनगर में मौसम का अब तक की सबसे सर्द रात रही। मौसम विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि जम्मू एवं कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में न्यूनतम तापमान शून्य से 6.8 डिग्री सेल्सियस नीचे दर्ज किया गया। 
इस बीच नियंत्रण रेखा के सीमावर्ती सेक्टरों में, राजौरी क्षेत्र से लेकर करगिल के अंतिम छोर तक, बर्फ की सफेद और कई फुट मोटी चादर बिछ गई है। सीमा के पहाड़ सफेद चादर में लिपटे हुए नजर आ रहे हैं। इस बर्फबारी के कई लाभ सीमा पर तैनात सैनिकों को मिलने की उम्मीद है।
 
उन्होंने बताया कि शहर में मौसम की अब तक की सबसे सर्द रात रही। इससे पहले यहां 21 दिसंबर को रात में सबसे कम तापमान शून्य से 6.5 डिग्री सेल्सियस नीचे दर्ज किया गया था। अधिकारी ने बताया कि रात का तापमान मौसम की इस समयावधि के दौरान सामान्य से पांच डिग्री सेल्सियस नीचे दर्ज किया गया। 
 
उन्होंने बताया कि पांच साल के बाद शहर में पहली बार जनवरी की रात में इतनी सर्दी रही है। 2012 में श्रीनगर में न्यूनतम तापमान शून्य से 7.8 डिग्री सेल्सियस नीचे दर्ज किया गया था। कल रात ठंड के कारण शहर और अन्य जगहों पर पानी आपूर्ति पाइपों और यहां की मशहूर डल झील सहित विभिन्न जलाशयों में पानी जम गया।
 
अधिकारी ने बताया कि उत्तर कश्मीर के मशहूर स्की रिसोर्ट गुलमर्ग में मौसम की सबसे सर्द रात रही। यहां का न्यूनतम तापमान शून्य से 14.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। उन्होंने बताया कि दक्षिण कश्मीर में कोकेरनाग में न्यूनतम तापमान शून्य से 8.3 डिग्री सेल्सियस नीचे दर्ज किया गया। लद्दाख क्षेत्र में लेह शहर जम्मू कश्मीर में सबसे ठंडा स्थान रहा। यहां का न्यूनतम तापमान शून्य से 17.0 डिग्री सेल्सियस नीचे दर्ज किया गया।
 
अधिकारी ने बताया कि नजदीकी शहर करगिल का न्यूनतम तापमान शून्य से 15.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। मौसम विभाग ने रविवार से बर्फबारी और बारिश होने की संभावना व्यक्त की है। इस बीच एलओसी के सीमावर्ती सेक्टरों में, राजौरी क्षेत्र से लेकर करगिल के अंतिम छोर तक, बर्फ की सफेद और कई फुट मोटी चादर बिछ गई है। 
सीमा के पहाड़ सफेद चादर में लिपटे हुए नजर आ रहे हैं। इस बर्फबारी के कई लाभ सीमा पर तैनात सैनिकों को मिलने की उम्मीद है। एलओसी के क्षेत्रों में होने वाली भारी बर्फबारी के बाद रक्षाधिकारियों को घुसपैठ के प्रयासों में कमी आने की सबसे बड़ी उम्मीद है। और यह उम्मीद बसंत ऋतु तक रहने की आस इसलिए बंध गई है क्योंकि जितनी बर्फ एलओसी के पहाड़ों पर गिर रही है उसे पार करने की कोशिश करने का स्पष्ट अर्थ होगा मौत को आवाज देना।
 
बकौल सेनाधिकारियों के, अब उनके जवानों का ध्यान पाक सेना की गतिविधियों की ओर ही रहेगा और घुसपैठ की ओर से वे सुनिश्चित हो जाएंगे, लेकिन यह सुनिश्चितता इतनी भी नहीं हो सकती क्योंकि पूर्व का अनुभव यह रहा है कि बर्फबारी के बावजूद कई बार पाकिस्तान ने घुसपैठियों को इस ओर धकेलने की कोशिश की है। एलओसी पर चौकसी तथा सतर्कता बरतने के लिए तैनात सैनिकों के लिए इस मौसम को राहत और आराम देने वाला कहा जाता रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारी बर्फबारी के कारण पारंपारिक घुसपैठ के मार्ग तो बंद हो ही जाते हैं पाकिस्तानी सैनिक भी गोलीबारी में कमी लाते रहे हैं।
 
लेकिन चौंकाने वाला तथ्य इस बर्फबारी के बाद का यह है कि इस बार भी सेना ने उन सीमा चौकिओं को खाली नहीं करने का निर्णय नहीं लिया है जो ऊंचाई वाले स्थानों पर हैं और भारी बर्फबारी के कारण वहां तक पहुंच पाना संभव नहीं होता। ऐसा निर्णय करगिल युद्ध के बाद ही लिया गया था।
 
और अब जबकि एलओसी पर जबरदस्त बर्फबारी हुई है सेना इन चौकियों का त्याग करने को तैयार नहीं है जो बर्फबारी के कारण शेष देश से अढ़ाई से तीन महीनों तक कटी रहेंगी। ऐसा निर्णय लेने के पीछे का मकसद यह है कि पाकिस्तान अब मौखिक समझौतों को नहीं मानता है और वह इस ताक में रहता है कि कब भारतीय सेना सर्दी के कारण अपनी सीमा चौकियों को खाली करे और वह उन पर कब्जा कर ले। हालांकि उड़ी सेक्टर में ऐसी चौकियों की मुक्ति के लिए कई बार युद्ध हो चुके हैं। वैसे इतना अवश्य है कि बर्फबारी के कारण पहाड़ों पर सक्रिय आतंकवादी अब नीचे जरूर आने लगे हैं।
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