विदेस भाजि आए हैं
- डॉ. सुभाष शर्मा
अपने ही देस में अपने ही लोगन केदांव-पेंच देखि हम विदेस भाजि आए हैंभेदभाव धन अभाव, देख के मनमुटावयहां देखो आज हम चैन ठोर पाए हैंपेट काटि बाप ने पाले थे पांच पूतउन सबके बीच में हम ही पढि पाए हैंउन्हें छोडि-छाडि पाछे उनके ही हाल पेदांव पाइ आज हम विदेस भाजि आए हैंमान हानि ताक धरि अपनेन को दूर करिधरती के दूसरे छोर पे हम आए हैंपैसा ही पैसा की देखि मारसगी मां को दै तलाक सौतेली पाए हैंकबहूं मन याद करत कबहूं भूलि जात हैकबहूं मन सोचत है सोचके पिरात हैकोई मति धीर पीर पे जब धरत हाथमन ही मन हिये में होत बरसात हैकबहूं अकुलात मन कबहूं उकतात मनकबहूं हम अपने ही देस को गरियात हैंकोई अनजान जब माटी को देत लातकाहे छोडि आए हम! जिया पछितात है।
सौजन्य से - गर्भनाल