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अपने ही देस में अपने ही लोगन के
दांव-पेंच देखि हम विदेस भाजि आए हैं
भेदभाव धन अभाव, देख के मनमुटाव
यहां देखो आज हम चैन ठोर पाए हैं

पेट काटि बाप ने पाले थे पांच पूत
उन सबके बीच में हम ही पढि पाए हैं
उन्हें छोडि-छाडि पाछे उनके ही हाल पे
दांव पाइ आज हम विदेस भाजि आए हैं

मान हानि ताक धरि अपनेन को दूर कर‍ि
धरती के दूसरे छोर पे हम आए हैं
पैसा ही पैसा की देखि मार

सगी मां को दै तलाक सौतेली पाए हैं


कबहूं मन याद करत कबहूं भूलि जात है
कबहूं


मन सोचत है सोचके ‍पिरात है
कोई मति ‍धीर पीर पे जब धरत हाथ
मन ही मन हिये में होत बरसात है

कबहूं अकुलात मन कबहूं उकतात मन
कबहूं हम अपने ही देस को गरियात हैं
कोई अनजान जब माटी को देत लात
काहे छोडि आए हम! जिया पछितात है।
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सौजन्य से - गर्भनाल
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