खास खबर | एनआरआई गतिविधि | एनआरआई सिनेमा | बहस | एनआरआई साहित्य
मुख पृष्ठ » लाइफ स्‍टाइल » एनआरआई » एनआरआई साहित्य » ईश्वर तुम छुप नहीं पाओगे
ND

रात के घने अंधकार
दिन की चिलचिलाती धूप
सूरज का पहरा
चांद की आंख मिचौली
तारों के मध्य कहां तक छिपोगे
सूरज के संग उगते
संध्या की गोद में खेलते
तेज धूप, वर्षा, ठिठुराती ठंड
कहां, कहां छिपोगे
खिलते फूलों में, पतझड़ में
सूखी नदी के क्रंदन में
उफनती नदी के उल्लास में
कब तक छुपोगे और कहां ‍तक
जन्म से मरण
प्रकृति के छद्म आवरण
भावनाओं में बहका कर
क्रूरता को कराते हो
तो कभी प्रेम की धार बहाते हो
मैं तुम्हें खोज ही लेता हूं
जब तक श्रद्धा विश्वास पर आरूढ़ है
तुम चाहकर भी नहीं छुप पाओगे
न मैं छुपकर रहने दूंगा तुम्हें।
संबंधित जानकारी
सौजन्य से - गर्भनाल
WebduniaWebdunia