प्रवासी हिन्दी कविता : खिड़कियां

- सुदर्शन प्रियदर्शिनी 
 
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उस दिन
अचानक
खिड़कियां
खुली रह गईं
और हवा ने
अंदर घुसकर
अन्यथा
मनमानियां
कर डाली- 
 
करीने से
सजी-रखी
चीजों के
रंग और ढंग
बदल डाले-
 
बिस्तर की
चादर उड़कर
अलानी-खाट
रह गई-
 
रसोई के बर्तन
एक रोंस से
सरककर
दूसरी रोंस
पर-सीधे मुंह
खड़े हो गए-
 
मेज की
तश्तरियां
इधर-उधर
‍बिखरकर
कमरे में
फैल गईं
मेज पर रखे
गुलदस्ते
के फूल
ब्रास की
मूर्ति पर
कुर्बान हो गए-
 
इसी तरह
सारा घर-लगा
तितर-बितर
होकर-बेतरतीब
लगने लगा-
 
अपनी भूल पर
गु्स्सा आया
और चीजें
समेटते-समेटते
हाथ ठिठक गए-
 
लगा-जो
जहां-होना
चाहिए-
वहीं हुआ
जहां नहीं
होना चाहिए
नहीं हुआ-
 
कहीं अति
करीना-पन
डस रहा है हमें-
मैं चुपचाप
बैठकर
चीजों को देखती रही
और सोचती रही
कभी-कभी
खिड़की खुली ही
रहनी चाहिए
प्रकृति और
हवा को
अंदर-बाहर होकर
सब कुछ प्रकृतिस्थ
कर देना चाहिए। 

(लेखिका कई सम्मानों से सम्मानित सम्प्रति अमेरिका की ओहायो नगरी में स्वतंत्र लेखन में रत हैं।)
साभार- विभोम स्वर 

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