प्रवासी साहित्य : गुदड़ी का लाल...



मैं अधजागा, अधसोया क्यों हूं?
मैं अब भी भूखा-प्यासा क्यों हूं?
क्या नहीं है?
क्या मैं नहीं हूं?

क्यों तन पर चिथड़े हैं मेरे?
क्यों मन मेरा रीता उदास है?
क्यों ईश्वर मुझसे छिपा हुआ है?
क्यों जीवन बोझ बना हुआ है?

आंखें मेरी सोएं तो कैसे?
और वे रोएं भी तो कैसे?

क्या हासिल होगा रोने से?
दु:ख जड़ गहरे पानी पैठा है।

क्या मैं भारत का बाल नहीं?
क्या मैं भी तेरा लाल नहीं?

क्यों सौभाग्य मेरे भाल नहीं?
क्यों प्रश्नचिह्न है जीवन मेरा?

बड़े आदमी बनने का सपना,
खुली आंखों से देख रहा हूं।
माता अब मेरे अश्रु पोंछ ले,
क्या मैं नहीं?

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