प्रवासी कविता : मुखौटे


- हरनारायण शुक्ला
 
(1) 
 
कहा किसी ने मुझको अंकल, देख के मेरे उजले बाल,
उसकी उमर पूछी मैंने, बड़ा था मुझसे वह दस साल। 
 
(2)
 
साठ बरस का हो गया, रंगता है वह बाल,
खुद को धोखा दे रहा, बूढ़ा सुन्दरलाल। 
 
(3)
 
गंजे सर पे चंदूलाल, विग चिपकाए रहता है,
उड़ा था विग इक झोंके में, हवा से अब वह डरता है। 
 
(4)
 
उसका नाम है बाबूलाल, पर कहलाता है बॉब,
सूट-बूट और टाई झाड़े, खोज रहा है जॉब। 
 
(5)
 
चौबेजी हैं शाकाहारी, बोतल से परहेज,
सबसे करते हैं वो नफरत, क्रोधी नंबर एक।
 

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