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लेखन श्रृंखला 4 : 'जीवन की एक यात्रा'

Author रेखा भाटिया|
कल के गुदगुदाते, खिलखिलाते हास्य कवि सम्मलेन की स्मृतियों से तरोताजा मन-मस्तिष्क, जो मुझे राले, नॉर्थ कैरोलिना में ही रोके रखना चाहता था और मेरा कर्तव्य मेरे शरीर को मेरी निर्धारित शार्लीट की की यात्रा की और धकेल रहा था। 

जिस अंदाज में अंतिम क्षण में मैंने आज ट्रेन पकड़ी है, मानो जासूसी और युद्ध की बड़ी जंग जीत जाने पर यह ट्रेन यात्रा मेरा पुरस्कार हो। मैंने भी अपना भारी-भरकम बैग ऊपर रैक पर धम से पटका और हौले से नीचे की सीट पर बैठ गई।
 
करती ट्रेन ने धीरे-धीरे गति पकड़नी शुरू की, प्लेटफॉर्म पर खड़े कुछ लोग अब भी हाथ हिला-हिलाकर आधी-अधूरी मुस्कान, आधी-अधूरी नम आंखों से ट्रेन की आखिरी झलक तक उसे विदाई दे रहे थे। ट्रेन के भीतर की हलचल अब थमने लगी थी। अपनी-अपनी सीटों पर धंसते अलसाते यात्री। सभी की आंखों में अलग-अलग भाव नजर आ रहे थे। 
 
इस छोटी-सी यात्रा में संक्षिप्त-सा सभी का साथ, पर सभी का यात्रा करने का अलग-अलग उद्देश्य। कुछ क्षण और गुजर जाने पर ट्रेन ने गति पकड़ी। अब भीतर का नजारा कुछ और हो गया। किताबें खींचकर बाहर आ चुकी थीं, कई आंखें उनमें गढ़ गईं।
 
लैपटॉप की टिक-टिक, कानों में ठुंसे हुए आई-टूंस, मचलते संगीत पर हौले-से थाप बजाते कुछ हाथ, कुछ पैर, कुछ के हाथ में कागज-कलम है। कुछ मैगजीन, न्यूज पेपर में खोए हैं। कइयों ने आंखें बंद कर अपने भीतर की दुनिया खोल ली है।
 
मोबाइल फोन पर लहराते कई स्वर कानों में डोल रहे हैं। बाहर लहराती हरियाली ने ट्रेन को अपने आंचल में समा लिया है। खुला नीला आकाश, इक्का-दुक्का बादल और अब इक्का-दुक्का छोटे-छोटे घर दिखाई देने लगे हैं। फिर दृश्य बदला। छोटे-छोटे खेत-खलिहान, फिर नन्ही-सी झील, फिर एक उजड़ी हुई फैक्टरी, कुछ आगे एक बड़ी मिल, साथ लगा हुआ वेयर हाउस, बहती नदी के ऊपर बने कमजोर-से दिखने वाले पुल पर तेजी से सरकती ट्रेन।
 
अब सड़कें दिखाई देने लगी हैं। उस पर रपट-रपट भागती गाड़ियों पर ट्रेन के आते ही ब्रेक लग गए, मानो रफ्तार से भागती ट्रेन को रास्ता देने के लिए सभी ने अपनी गति थाम ली हो। ट्रेन के भीतर की दिनचर्या शुरू हो चुकी थी। आगे की सीट पर जीवन की आधी सदी पर कर चुकी एक सभ्य महिला मोबाइल पर वार्तालाप में मगन थी। उसके स्वर में खुशी, तीखापन, आनंद, शुद्धता और गहराई थी। वह अपनों के साथ फोन पर ही जीवन का लुत्फ उठा रही थीं। इधर-उधर ध्यान भटकने के बाद मेरा ध्यान उसने अपनी ओर खींच लिया और वो मेरी इस संक्षिप्त यात्रा के हर पल, हर क्षण, हर अनुभव का हिस्सा बन गई। 
 
अचानक ब्रेक लगे, ट्रेन की गति थमने लगी, मेरी तंद्रा भंग हुई, उस महिला के स्वर में रुकावट आ गई, ट्रेन अगले स्टेशन पर रुक गई, भीतर-बाहर का दृश्य बदला। कुछ नए यात्री जल्दबाजी में ग्रामों से लेकर टनों बोझ घसीटते ट्रेन में भीड़ बढ़ाते कुछ खाली पड़ी सीटों पर कब्जा जमाने लगे। हर कोई अपने लिए बेहतर से बेहतर वाली सीट चाहता था। खिड़की पास में हो, अपने साथ वाली सीट पर कोई न बैठा हो, एक टिकट में दो सीटों का मजा, भीड़भरी ट्रेन में भी निजता और अकेलेपन को ढूंढता!
 
 
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