एनआरआई कविता : जहां खुशियां बसती हैं...

मेरे का वो कोना जहां खुशियां बसती हैं,
 
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> हंसता-खिलखिलाता है बचपन,> नई उम्मीदें जगती हैं, रूठा रहता है बालपन,
राग बदलता है,
मस्ती की फुहार चलती है,
नृत्य करतीं जिज्ञासु आंखें,
नए रंग, नया अनुभव,
नईं दिशाएं भरती हैं,
प्रतिदिन एक नया अध्याय जुड़ता है,
नवजीवन की एक इक किताब लिखती है,
ममता की छांव में बैठी मैं वहां,
जहां मेरे घर के कोने में खुशियां बसती हैं।


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