24 अक्टूबर 1929 को शुरुआती कारोबार के बाद ही न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक डाउ जोंस औंधे मुँह गिरा और एक ही दिन में 1.29 करोड़ शेयरों की बिकवाली हो गई थी।
इसने अमेरिकी शेयर बाजार को अगले 25 वर्ष की मंदी की ओर धकेल दिया और वॉल स्ट्रीट पर स्थित इस स्टॉक एक्सचेंज के लिए 24 अक्टूबर 1929 का यह दिन ब्लैक थर्सडे के नाम से जाना गया।
ब्लैक थर्सडे को शेयर बाजार में आई करीब 13 फीसदी की अप्रत्याशित गिरावट और कई शेयरधारकों के वित्तीय बाजार से बाहर हो जाने के बाद 28 और 29 अक्टूबर को भी शेयरों के गोता लगाने का सिलसिला जारी रहा। इन दो दिनों को ब्लैक मंडे और ब्लैक ट्यूजडे के नाम से जाना गया।
29 अक्टूबर 1929 को रिकॉर्ड 1.60 करोड़ शेयरों की बिकवाली हुई। इस गिरावट ने 30 के दशक के बाद आई मंदी द ग्रेट डिप्रेशन की शुरुआत की।
ब्लैक थर्सडे के बाद निर्मित हुई स्थिति को दि ग्रेट वॉल स्ट्रीट क्रैश ऑफ 1929 कहा गया। इस वजह से न्यूयॉर्क शेयर बाजार में अगले करीब 25 वर्ष तक मंदी बनी रही। तीन सितंबर 1929 को डाउ जोंस का औद्योगिक औसत सूचकांक 381.17 पर था।
इसे इस आँकड़े को दोबारा छूने में 25 वर्ष लग गए। कुछ व्यावसायिक बैंकों द्वारा जमा राशि को शेयर बाजार के जोखिम में झोंक देने से ऐसा हुआ।
अक्टूबर 1929 से पहले कुछ वित्तीय कंपनियों के शेयरों में उछाल आता रहा, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति खराब होते ही शेयरों की कीमतें गिरने लगीं और बिकवाली ज्यादा होनी लगी।
श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के बैंकिंग और वित्तीय संकट विशेषज्ञ संतोष कुमार बताते हैं कि दि ग्रेट वॉल स्ट्रीट क्रैश के कारणों की जाँच करने के लिए गठित अमेरिकी कांग्रेस की समिति की सिफारिशों पर बाद में एक कानून ग्लास स्टीगेल भी बना। इसके तहत स्पष्ट किया गया कि व्यावसायिक बैंकों और निवेश बैंकों का कामकाज अलग-अलग रहेगा, ताकि लोगों की जमा पूँजी सुरक्षित रखी जा सके।
उन्होंने कहा कि अमेरिका के इस नए कानून ने वहाँ की फेडरल रिजर्व को मजबूत बनाया और बैंकों की स्थिति दोबारा बेहतर करने में मदद मिली।
वर्ष 1939 में अमेरिकी शेयर बाजार के गोता लगाने के बाद महामंदी आई थी। इस वर्ष भी अक्टूबर में विश्वभर के शेयर बाजारों में काफी गिरावट देखी गई।
कुमार मानते हैं कि यह भी एक तरह की महामंदी का ही संकेत है, क्योंकि ग्लास स्टीगेल कानून को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के कार्यकाल में कुछ शिथिल कर दिया गया था। इससे बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति वर्ष 1929 जैसी होनी ही थी। अर्थशास्त्र विषय के प्राध्यापक कुमार कहते हैं इस वर्ष अर्थशास्त्र के नोबल के लिए चुने गए पाल क्रुगमैन ने भी संकेत दिए हैं कि मौजूदा स्थिति वर्ष 1929 के जैसी ही है। अर्थव्यवस्था एक और ग्रेट डिप्रेशन की दहलीज पर खड़ी नजर आ रही है।
वे बताते हैं वर्ष 1929 के क्रैश और मौजूदा समय को देखें और प्रतिशत के अनुसार गणना की जाए तो मौजूदा नुकसान कम दिखेगा, लेकिन अगर मुद्रा को आधार बनाकर गणना करें तो हम पाएँगे कि अब की बार नुकसान कहीं ज्यादा हुआ है। (भाषा) |