- अजय श्रीवास्तव वैश्विक वित्तीय संकट से भारत अछूता नहीं रह सकता। अगर अमेरिका संकट का असर दुनिया पर पड़ रहा है, तो भारत पर भी उसका असर पड़ेगा। इससे भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रभावित होगा। निर्यात के मोर्चे पर भी हम परेशानी में पड़ सकते हैं।
यह बयान किसी आर्थिक विश्लेषक का नहीं, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह का है। प्रधानमंत्री के इस बयान से साफ है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सबप्राइम के कारण आए वित्तीय संकट का दीर्घकाल में भारत पर भी बड़ा असर पड़ेगा।
अमेरिका में आई वित्तीय सूनामी ने भारत के अर्थ जगत के खिलाड़ियों की नींद उड़ा दी है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका में आए संकट से भारत के विकास के रास्ते में बाधा आ सकती है। हालाँकि, अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के 700 अरब डॉलर के राहत यानी बेलआउट पैकेज को कांग्रेस की मंजूरी मिल गई है, लेकिन इसके बावजूद भारत सहित दुनिया भर के शेयर बाजारों का जो रुख है, उससे यहीं संदेश जाता है कि इस पैकेज से स्थिति में बहुत ज्यादा सुधार की गुंजाइश नहीं है।
विश्लेषकों का कहना है कि लीमन ब्रदर्स के दिवालिया होने का भारतीय कंपनियों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। लीमन ब्रदर्स का भारतीय कंपनियों में निवेश 2,000 करोड़ रुपए के आसपास है। कई भारतीय कंपनियों की परियोजनाओं में भी लीमन की हिस्सेदारी है। इसके ढहने का सबसे ज्यादा असर निजी क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक आईसीआईसीआई बैंक पर पड़ता दिख रहा है।
साथ की सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ बैंक भी इसकी आग में झुलसेंगे। बहरहाल, आकलन है कि आईसीआईसीआई बैंक को लीमन के कारण 2.8 करोड़ डॉलर का घाटा होगा। इसके अलावा कई और कंपनियाँ भी हैं, जो चिंतित हैं, क्योंकि लीमन ब्रदर्स इन्वेस्टमेंट के पार्टिसिपेटरी नोट्स के जरिये इन कंपनियों में ध्वस्त हो चुके निवेश बैंक का पैसा लगा है।
वेस्ट कोस्ट पेपर मिल्स, और केपीआईटी कमिंस इन्फोसिस्टम्स में लीमन का निवेश है। सच्चाई यह है कि दिवालिया घोषित किए जाने के आवेदन के बाद लीमन को भारत में निवेश पर 50 करोड़ रुपए से अधिक का घाटा हो चुका हो चुका है। टीसीएस, इन्फोसिस और सत्यम जैसी आईटी कंपनियाँ वॉल स्ट्रीट की स्थिति से चिंतित हैं। भारत में लीमन ब्रदर्स ने अरबों का कारोबार आईटी कंपनियों में आउटसोर्स किया हुआ है। |