- बहादुरसिंह गेहलोत प्रवासी पक्षी दाना चुगने आए थे और अब वापस जा रहे हैं। इन प्रवासी पक्षियों ने छोटे-छोटे भारतीय निवेशकों को एक बार पुनः सड़क पर खड़ा कर दिया। देश की आर्थिक विकास दर 8 हो या 9 प्रश किंतु मुंबई शेयर सूचकांक तो 21 से घटकर साढ़े 12 हजार पर आ गया है। अभी भी स्थिरता कहाँ है। छोटे निवेशकों के पॉकेट खाली हो चुके हैं। आईपीओ में अरबों रुपए फँस गए हैं। वे मूल कीमत से भी नीचे चले गए हैं।
पिछले तीन दशक में शेयर बाजार में अनेक कांड हुए हैं और बाजार को डूबने का नाम दे दिया। हर्षद मेहता, केतन पारिख-आदि को शेयर बाजार डुबाने के लिए दोषी माना गया था। किंतु वर्ष 2004 से 2008 की अवधि में 6000 से 7000 से बढ़ता शेयर सूचकांक 21000 को पार कर गया।
यह भी उल्लेखनीय है कि 14000 से 21000 तक का सफर जिस तेज गति से किया, उसी समय यह भय लगा रहा था कि बाजार किसी दलदल में न फँस जाए। उस समय महँगाई के अलावा अनेक ऐसे कारण थे जिससे बाजार की बढ़त को रुकना था, किंतु वित्तमंत्री ने अनेक बार एवं एकाध बार प्रधानमंत्री ने वक्तव्य देकर निवेशकों को भरोसा दिया था कि बाजार में जोखिम नहीं है। आर्थिक विकास दर 9 प्रश से अधिक रहेगी।
विदेशी मुद्रा भंडार लबालब भरा हुआ है। देश तरक्की कर रहा है। इसी बीच अनेक बड़ी-बड़ी कंपनियों के आईपीओ देखते ही देखते कई गुना भरते चले जा रहे थे। वित्तमंत्री के बार-बार दिए गए आश्वासनों से भारतीय निवेशकों की आईपीओ में 1367 करोड़ की पूँजी फँस गई है। जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी के कार्यकाल में उनकी सरकार को फील गुड की बीमारी लग गई थी, उसी तरह वर्तमान प्रधानमंत्री को देश की आर्थिक विकास दर के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है।
विकास दर चाहे कुछ भी हो, आम जनता महँगाई, बेरोजगारी, आतंकवाद, बाढ़, असुरक्षा आदि अनेक समस्याओं से त्रस्त है। आम जनता आज सुखी नहीं है। पिछले वर्षों में अधिक वेतन देने एवं वायदा कारोबार में चल रही सट्टेबाजी से महँगाई बढ़ी है। दूसरी ओर बैंकों की ब्याज दर कम होने से छोटे निवेशकों ने अपनी आदत के अनुसार रातोंरात बिना पसीना बहाए लखपति बनने का सपना देखा तथा सपना देखते-देखते शेयर बाजार की चकाचौंध में चले गए।
इस चकाचौंध में महाराष्ट्र-गुजरात के लाखों नवयुवक-युवतियाँ चपेट में आ गए हैं। आज बिना किसी काँड के शेयर सूचकांक 21000 से घटकर 12500 पर आ गया है। अगले 6 माह में इससे भी नीचा चला जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ऐसी स्थिति में छोटे निवेशक बिना कोई बॉण्ड कैसे लुट गए? इसके लिए कौन जवाबदार है?
अमेरिका में भारी-भरकम डूबत कर्जों के लिए 700 अरब डॉलर का पैकेज स्वीकार किया गया है। उसके बाद ही विश्वभर के शेयर बाजारों में स्थिरता आ सकेगी। वित्तमंत्री पी. चिदंबरम बार-बार यह घोषणा करते हैं कि अमेरिकी संकट का अधिक प्रभाव भारतीय शेयर बाजार पर नहीं पड़ेगा किंतु बाजार तो टूटता ही जा रहा है। अनेक भारतीय कंपनियाँ अंदर ही अंदर पानी बिना मछली की तरह तड़प रही हैं। उन्हें भारत सरकार बचा लेगी?
शेयर बाजार जिस हालत में पहुँच चुका है, वह काफी नहीं है अथवा यहाँ से पुनः आगे बढ़ने वाला है। देश में फसलों के मान से मानसून अच्छा रहा। परमाणु समझौते पर भी अमेरिकी मोहर लग चुकी है। पिछले रबी सीजन में गेहूँ-चावल की वसूली उम्मीद से अधिक मात्रा में हुई है। खाद्यान्न के भंडार भरे पड़े हैं किंतु दूसरी ओर महँगाई ने आम जनता को अंदर ही अंदर परेशान करके रख दिया है। आम जनता की क्रयशक्ति घटी है।
उपभोक्ता बाजारों की हालत खराब है। पिछले 3-4 वर्षों से अमेरिकी पद्धति से भारत में 0 प्रश ब्याज दर पर लाखों उपभोक्ता वस्तुएँ बेच दी गईं, अब उधार लेने वालों की हिम्मत भी जवाब दे गई है। अमेरिका में उधारी वापस न करने वालों के लिए अरबों रुपए के पैकेज घोषित किए जा रहे हैं, किंतु भारत में मकान की किस्तें न भरने वालों के मकान नीलाम किए जा रहे हैं। दो-चार पहिया वाहनों को किस्तें न चुकाने पर बैंकों के गोदामों में एकत्र किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में उद्योगों के पहिए रुकना स्वाभाविक है, ऐसी स्थिति बन चुकी है।
वित्तमंत्री चाहे जो कहे, भारतीय शेयर बाजार पर से जोखिम पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई है। अमेरिका और योरप के विदेशी निवेशक अपना निवेश वापस ले जाने में लगे हुए हैं। इन्हें रोकने के लिए भी कोई कारगर घोषणाएँ नहीं की जा रही हैं। यही वजह है कि भारत, ब्राजील एवं चीन के उभरते शेयर बाजारों में गिरावट आ रही है। भारत में निकट भविष्य में ब्याज दरों में कमी के लक्षण दिखाई नहीं दे रहे हैं। |