- बहादुरसिंह गेहलोत
वर्तमान में शेयर बाजार की हालत को देखते हुए ऐसा आभास होता है पिछले चार वर्ष से इन्हीं वित्तमंत्री के कार्यकाल में प्रवासी पक्षियों ने भारत में अपना घोंसला बनाया था, वे अब उड़ते नजर आ रहे हैं। अर्थात प्रवासी भारतीयों को भारत की आर्थिक विकास दर अब प्रभावित नहीं कर रही है और न इन अर्थशास्त्रियों की नीतियाँ।
इससे जिस गति से भारतीय शेयर सूचकांक बढ़ा था, शायद उससे अधिक तेज गति से गिर रहा है। यह सही है कि कच्चे तेल की कीमतों में आशा के विपरीत वृद्धि हो रही है। अमेरिका की आर्थिक हालत भी खराब है। भारत में महँगाई ने स्थायी रूप धारण कर लिया है। ब्याज दर में वृद्धि, मानसून की वर्षा में देरी के साथ वामपंथी दलों के कड़े रुख, म्युच्युअल फंडों का सूचकांक में गिरावट के बाद भी खरीदी से बाहर रहने से शेयर बाजार डूबता जा रहा है।
8 जनवरी को मुंबई शेयर सूचकांक 21077 तक चला गया था। आज छः माह से कुछ अधिक दिन में एक तिहाई सूचकांक डूब चुका है। निवेशकों के अरबों रुपयों पर पानी फिर गया। कमोडिटी वायदा, कच्चा तेल एवं शेयरों में वायदा कारोबार ने शेयर बाजार को भी पूरी तरह से डुबाया है। अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में वित्तमंत्री फेल होते नजर आ रहे हैं। इसका प्रतिफल इन नेताओं को नहीं आम जनता को भुगतना पड़ेगा।
प्रत्येक शुक्रवार को मुद्रास्फीति की दर की घोषणा के पूर्व ही बाजार टूट जाता है। वित्त मंत्री प्रत्येक शुक्रवार को नए कदम उठाने की घोषणा करते हैं। ले-देकर केवल रिजर्व बैंक पर आकर गाड़ी रुक जाती है। रिजर्व बैंक द्वारा साख नियंत्रण की एक सीमा है। अंत में यदि महँगाई रोकना है, तो वे सभी कठोर कदम उठाना पड़ेंगे, जो आज नहीं उठा पा रहे हैं। सख्त कदम उठाने का समय भी अब कम रह गया है। अर्थात् वित्तमंत्री स्वीकार करें अथवा नहीं आज उनकी कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लग गया है?
|