- विट्ठल नागर
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दर न घटाने से उद्योग एवं व्यापार क्षेत्र में निराशा फैलना अस्वाभाविक नहीं है, किंतु अगर वे गहराई से सोचें तो रिजर्व बैंक का कदम अमेरिका व योरप के हितों के विपरीत है। ये देश चाहते हैं कि भारत व अन्य उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों की केंद्रीय बैंकें ब्याज दर घटाएँ, ताकि वहाँ उपभोक्ता माँग ब़ढ़े एवं अमेरिका व योरपीय देशों का निर्यात बढ़े।
उनके श्रम बाजार तेजी में आ जाएँ, क्योंकि उन्नात देशों में बन रही आर्थिक मंदी की स्थिति की वजह से उनका औद्योगिक उत्पादन घट रहा है एवं बेरोजगारी की दर बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) भी विश्व के देशों से कह रहा है कि वे ब्याज दर घटाएँ।
दूसरी बात यह है कि ब्याज दर न घटाना देश के उद्योग व व्यापार के हित में है। अगर ब्याज दर घटाने से मुद्रास्फीति बढ़ जाए तो वह न तो देश के उपभोक्ताओं के हित में होगी और न ही उद्योग व व्यापार के। दिसंबर 2007 की समाप्त तिमाही में देश के औद्योगिक क्षेत्र के विक्रय में करीब 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उनके कामकाजी लाभ में करीब 24 प्रतिशत की एवं सकल लाभ में 22 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है।
आज दुनिया में चीन को छो़ड़कर ऐसी वृद्धि कहीं दिखाई नहीं देती। इसीलिए 31 मार्च 2008 को समाप्त होने वाले वर्ष में जीडीपी की वृद्धि की दर 9 प्रतिशत के करीब रहने का अनुमान है। ब्याज का भार निश्चय ही बढ़ा है, किंतु जब बढ़ी-चढ़ी ब्याज की लागत के बावजूद उद्योग अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं एवं अपनी उत्पादन क्षमता का तेजी से विस्तार कर रहे हों तो चिंता या निराशा व्यक्त करने की कोई वजह नहीं है। कुछ औद्योगिक क्षेत्र जरूर धीमेपन के शिकार हैं, संभव है अगले माह बजट में उन्हें कुछ लाभ मिल जाए।
तीसरी बात यह है कि जब अमेरिकी फेडरल (या फेड) रिजर्व और अधिक ब्याज दर घटाने वाला हो तो भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उसका जायजा लिए बगैर ही ब्याज दर घटाना कैसे संभव है। जब देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक आर्थिक कारणों से खतरा अधिक हो तो वैश्विक कारणों को समझना एवं उनके परिणामों को आँकना क्या बुद्धिमानी नहीं होगी? अभी कनाडा, ऑस्ट्रेलिया व मैक्सिको को अमेरिका की देखादेखी ब्याज दर घटाना पड़ी है। योरपीय यूनियन ने भी ब्याज दर घटा दी है।
दक्षिण कोरिया, ताईवान व फिलिपीन्स ब्याज दर घटाने का निर्णय ले रहे हैं, क्योंकि इन सबकी अर्थव्यवस्था अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात पर टिकी है। ब्रिटेन में भी ब्याज दर घटाने की माँग की जा रही है, क्योंकि वहाँ उपभोक्ता माँग घट गई है एवं औद्योगिक उत्पादन घट रहा है। भारत में न तो औद्योगिक उत्पादन पर कोई विशेष विपरीत प्रभाव पड़ा है और न ही उपभोक्ता माँग घटी है। फिर भारत को ब्याज दर क्यों घटाना चाहिए?
आज अमेरिका में ब्याज दर 3 प्रतिशत है। भारतीय रिजर्व बैंक के लिए यह देखना जरूरी है कि वहाँ 31 मार्च तक ब्याज दर में कितनी कमी होती है एवं भारत में डॉलर की आवक कितनी बढ़ती है। इन सबके आकलन के बाद ही (वैश्विक परिदृश्य को भाँपकर) उचित निर्णय लिया जा सकेगा।
चौथी बात वैश्विक नहीं, वरन् घरेलू है एवं मुख्य रूप से मुद्रास्फीति से संबंधित है। एक मायने में समस्या वैश्विक परिदृश्य से संबंधित भी है। अगर विश्व में खनिज तेल व खाद्य वस्तुओं के भाव बढ़ेंगे तो उससे देश में भी महँगाई बढ़ेगी, क्योंकि देश दोनों का आयात बढ़-चढ़कर करता है। फिर देश में अभी तेल (पेट्रोल-डीजल) के भाव बढ़ाए नहीं गए हैं, किंतु उसमें वृद्धि की पूरी संभावना है।
अगर आज देश में मुद्रास्फीति की दर 3 प्रतिशत है तो पेट्रोल व डीजल के भाव बढ़ते ही वह 4 प्रतिशत के स्तर पर पहुँच जाएगी। फिर खाद्य तेल, दालें, चावल आदि के भाव बढ़ने (क्योंकि देश में इनकी उपलब्धि माँग से कम है) पर महँगाई व मुद्रास्फीति की दर 5 प्रतिशत तक पहुँच सकती है, जबकि भारतीय रिजर्व बैंक की पहल दर को 5 प्रतिशत से कम बनाए रखने की है।
लिहाजा बैंक ब्याज दर घटाना कुछ जोखिमों से युक्त है, क्योंकि ब्याज दर घटाने से अर्थव्यवस्था में तरलता अधिक बढ़ सकती है जो कि महँगाई को जन्म देती है। दूसरा यह भी है कि अगर देश में डॉलर की आवक बढ़ी तो अर्थव्यवस्था में तरलता अधिक बढ़ेगी और रिजर्व बैंक को जब-तब ब़ढ़ी हुई तरलता को ऊँची ब्याज दर पर सोखना पड़ेगा।
अगर देश में डॉलर की आवक न भी ब़ढ़ी तो भी चालू खाते के घाटे को पाटने के लिए डॉलर की जरूरत महसूस होगी। अगर अधिक डॉलर देश के बाहर जाने लगे (एफआईआई के बेचान की वजह से) तो हालत अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से कर्ज लेने की बन सकती है। ऐसी हालत पैदा न हो, इसके लिए अनिवासी भारतीय देश में डॉलर भेजते रहें इसके लिए ब्याज दर ऊँची रखना जरूरी है, क्योंकि ऊँची ब्याज दर का लाभ उठाने के लिए वे अपनी बचत के अधिक से अधिक डॉलर भारत की बैंकों में जमा कराना पसंद करेंगे।
इसलिए ब्याज दर न घटाना समझदारीपूर्ण कदम निरूपित किया जा सकता है। वैसे यह दलील दी जा सकती है कि शेयर बाजार की तेजी को प्रोत्साहित करने के लिए ब्याज दर घटाना चाहिए थी, किंतु यह दलील न तो उचित है और न ही आज की स्थिति में मौजूँ है। जब विश्व के शेयर बाजार अस्थिरता के शिकार हो रहे हों, तब भारत के शेयर बाजार में अप्राकृतिक रूप से तेजी की स्थिति बनाने के प्रयास छोटे निवेशकों के हित में नहीं होंगे। ऐसी तेजी की स्थिति कभी भी भरभराकर ढह सकती है।
सही बात यह है कि विकसित देश स्टेगफ्लेशन के शिकार हैं। इसमें आर्थिक वृद्धि दर बहुत धीमी पड़ जाती है, साथ ही वहाँ अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति तेजी से बढ़ने लगती है। स्थिति से उबरने के लिए मुद्रा प्रसार बढ़ाकर एवं ब्याज दरें घटाकर उपभोक्ता माँग को बढ़ावा दिया जाता है, जबकि उभरते देशों में स्थिति स्टेगडीफ्लेशन की होती है। इसमें मुद्रास्फीति घटती है एवं वृद्धि दर भी मंद पड़ती है। वास्तव में आर्थिक सिकु़ड़न को ही डीफ्लेशन कहते हैं। इसलिए दोनों स्थितियों में अलग-अलग आर्थिक उपायों का सहारा लेना पड़ता है।
भारत जैसे देश के लिए ब्याज दर घटाना उचित हो सकता है, किंतु सबसे पहला कदम मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखना है। संभवतया इसीलिए रिजर्व बैंक के गवर्नर डॉ. वायवी रेड्डी ने बैंकों से कहा है कि वे ब्याज दर घटाएँ, क्योंकि ब्याज पर किए जाने वाले व्यय की तुलना में उनकी ब्याज की आय अधिक है, इसलिए निवल ब्याज मार्जिन अधिक है। अमेरिका का उदाहरण लिया जाए तो वहाँ ब्याज दर (ब्याज की नीतिगत दर) 3.5 प्रतिशत है एवं ब्याज की बाजार दर (पीएलआर) 5.75-6 प्रश है अर्थात वहाँ नीतिगत व बाजार दर में 225-250 बिंदुओं का फर्क है।
भारत में नीतिगत दर 7.75 प्रश एवं बाजार दर (पीएलआर) 13.25 प्रश है। दोनों में 550 बिंदुओं का फर्क है अर्थात बैंकों का ब्याज व्यय दर कम है एवं ब्याज आय दर वैश्विक बैंकों की तुलना में बहुत अधिक है। रिजर्व बैंक ने कहा है कि बैंकों को खुद होकर पीएलआर दर घटाना चाहिए। उसमें आधे प्रतिशत (50 बिंदुओं) की कमी की ही जा सकती है। इसलिए फरवरी में तो नहीं, पर मार्च के अंतिम पखवाड़े तक बैंक ब्याज दर में आधे प्रतिशत की कमी संभव है।
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