महँगाई के इस दौर में जब एक प्याली चाय की कीमत तक तीन रुपए है, उत्तर प्रदेश में महोबा के चरखारी कस्बे के सौ से अधिक मंदिरों के पुजारी आज भी दो रुपए मासिक वेतन पा रहे हैं।
दो रुपए महीने के पगार में पुजारियों को चौबीस घंटे मंदिर में रहकर पूजा करनी होती है तथा भगवत भजन करना होता है। करीब दो सौ साल पहले रियासत काल में चरखारी के तात्कालिक शासक ने यहाँ 108 देव मंदिरों का निर्माण कराया था।
मंदिरों के रखरखाव पर होने वाले व्यय की पूर्ति के लिए कृषि भूमि को जोड़ दिया गया। भगवान की पूजा के लिए पुजारी नियुक्त किए गए। समय बदलने के साथ रियासतों का भारत में विलय हो गया। रियासत की पूरी सम्पदा प्रशासन के हाथ आ गई लेकिन मंदिरों के पुजारियों की किस्मत नहीं बदली। रियासतकाल में उन्हें जो वेतन मिल रहा था वह अब भी कायम है।
धर्मादा पुजारी संघ के भगवानदास शास्त्री ने कहा कि रियासत काल में मिलने वाली दो रुपए पगार इसलिए पर्याप्त थी कि उस समय मुद्रा चाँदी की हुआ करती थी लेकिन आजाद भारत में कागज की मुद्रा के चलन के बाद दो रुपए की कीमत नहीं रह गई है।
आज के हालात को देखते हुए उच्च अधिकारियों से कई बार वेतन वृद्धि के लिए अनुरोध किया गया लेकिन परिणाम शून्य रहा।
उन्होंनें कहा कि पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश में भी रियासतकाल में ऐसे ही मंदिरों का निर्माण किया गया था और प्रशासन ने पुजारियों का वेतन बढ़ाकर एक हजार दो सौ रुपया प्रतिमाह कर दिया गया।
शास्त्री ने कहा कि पुजारियों से काम तो बंधुआ मजदूरों की तरह चौबीस घंटे तक लिया जा रहा है, लेकिन बदले में इतनी राशि भी नहीं दी जा रही कि एक कप चाय पी जा सके। |