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झारखंड के निर्दलीय विधायकों का सत्ताप्रेम
राँची (वार्ता) झारखंड ने अलग राज्य गठन के बाद लगभग छह मुख्यमंत्री देखे, लेकिन राज्य में निर्दलीय विधायकों की एक ऐसी जमात है, जो कभी विपक्ष में बैठी ही नहीं।

सूबे की कमान राजग के हाथ में हो अथवा संप्रग के इन्हें अब तक कोई फर्क नहीं पड़ा। राजग शासन काल में जी-5 के नाम से मशहूर और संप्रग शासन काल में हम सात का झुकाव हमेशा से सत्ता की ओर ही रहा है।

आँकड़ों की बात करे तो चाहे वो मांडर के विधायक बंधु तिर्की हो या जरमुंडी के हरिनारायण राय या फिर कोलिबेरा के एनोस एक्का, इनके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री और जगन्नाथपुर विधानसभा सीट से चुनकर आए मधु कोड़ा को राज्य के प्रथम विधानसभा चुनाव के बाद शुरू हुई निर्दलीय की पूछ का सीधा फायदा जमकर मिला है।

वर्ष 2005 से अब तक सरकार द्वारा प्रकाशित झारखंड डायरी के पन्नों को पलटे तो सूबे के मुखिया के नाम बदलते रहे हैं, कभी अर्जुन मुंडा तो कभी मधु कोड़ा लेकिन हर नए कैबिनेट में इन निर्दलीय विधायकों के नाम शामिल है।

हर नई सरकार के साथ विधानसभा में हाँ पक्ष की तरफ बैठने वाले इन निर्दलीय विधायकों ने ना पक्ष की तरफ बैठने की कभी जहमत नहीं उठाई। हर सरकार को अपना समर्थन देने के लिए इन निर्दलीय विधायकों के पास जायज वजह और मुक्कमल मुद्दे होते हैं।

राज्य गठन के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव के बाद बनी भाजपा नीत अर्जुन मुंडा के नेत्तृव में राजग सरकार के प्रति अपनी वफादारी निभाने के लिए इन विधायकों का समूह झारखंड से राजस्थान तक गया। इतना ही नहीं इन्होंने अजमेर शरीफ ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में चादर चढ़ाकर मुंडा सरकार की लंबी उमर की कामना भी की।

कुछ दिनों के साथ के बाद जब इन्हें लगा कि राजग गठबंधन इनके विकास मानक पर खरा नहीं उतर रहा तब इन्होंने उससे नाता तोड़कर भारतीय राजनीति के इतिहास में तीसरे निर्दलीय मुख्यमंत्री के रुप में मधु कोड़ा का नाम जोड़ दिया।

हालाँकि कोड़ा को इन विधायकों के समर्थन से लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में सबसे लंबे निर्दलीय मुख्यमंत्री होने का खिताब तो मिला परंतु इन्ही की वजह से कोड़ा को सत्ता छोड़नी पड़ी। उल्लेखनीय है कि झारखंड के अलावा मेघालय और उड़ीसा में भी निर्दलीय विधायक मुख्यमंत्री पद संभाल चुके हैं।

संप्रग के प्रमुख घटक झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा कोड़ा सरकार से समर्थन वापसी के बाद इन निर्दलीयों ने 'हम सात साथ है' का नारा देकर एकबारगी शिबू सोरेन के मुख्यमंत्री बनने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया और बाद में सभी राजनीतिक मूल्यों को ताक पर रखते हुए उनके साथ हो गए।

लगभग दस दिनों तक राजनीतिक उठा पटक के बाद जब सोरेन ने मुख्यमंत्री पद की दावेदारी की तो ये निर्दलीय गुरुजी के साथ कदम से कदम मिलाकर उनकी सरकार की शोभा बढ़ाने राजभवन तक जा पहुँचे।

केन्द्र और राज्य में सरकार बचाने और गिराने में राजनीतिक पार्टियों की अहम भूमिका होती है, लेकिन झारखंड में इन निर्दलियों ने यह साबित कर दिया है कि सूबे के मुखिया के घर जाने वाली हर सड़क उनके घर से ही होकर गुजरती है।
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