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चरित्र को यादगार बनाता है अभिनेता
जाने माने निर्माता निर्देशक रामगोपाल वर्मा मानते हैं कि अभिनेता और स्टार में अंतर होता है। अभिनेता एक चरित्र को यादगार बना देता है, जबकि स्टार का अपना करिश्मा अद्वितीय होता है और चरित्र उसके आगे गौण हो जाता है।

वर्मा ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि अभिनेता अपने द्वारा अभिनीत चरित्रों के साथ एकाकार हो जाता है और वही उसकी पहचान बन जाते हैं, जबकि स्टार हमेशा अपनी अलग पहचान बनाए रखता है।

वर्मा ने फिल्म सत्या के रिलीज के बाद आयोजित एक समारोह का जिक्र करते हुए ब्लॉग में लिखा है कि समारोह में मनोज बाजपेयी और शाहरूख दोनों मौजूद थे। भीड़ भीखू भाईं चिल्ला रही थी और मनोज खुश हो रहे थे। तब वर्मा ने मनोज से कहा कि उन्हें पता होना चाहिए कि लोग उन्हें वास्तविक नाम से नहीं बल्कि उनके द्वारा अभिनीत चरित्र के नाम से पुकार रहे हैं।

उन्होंने लिखा है कि तब तक शाहरूख करीब 25 सुपर हिट फिल्में दे चुके थे, लेकिन किसी को भी उनकी किसी भी फिल्म के चर्चित चरित्र की याद नहीं आए। लोग उनकी मौजूदगी से अभिभूत हो रहे थे। यही होता है स्टार का करिश्मा।

उन्होंने लिखा है कि अगर एक खास चरित्र पर आधारित फिल्म बनाई जाए तो स्टार उसमें बाधक बन सकता है, क्योंकि उसकी अपनी एक इमेज बन चुकी होती है। उससे लोगों की उम्मीदें अलग और अधिक होती हैं। जॉन अब्राहम इसका उदाहरण हैं।

वर्मा ने लिखा है कि फिल्म धूम में जॉन जिस तरह दिखाई दिए उन्हें लोगों ने खूब पसंद किया। लेकिन वही जॉन जब बदले लुक में नो स्मोकिंग में नजर आए तो लोगों ने उन्हें नकार दिया।

वर्मा कहते हैं कि निर्देशक को यह समझना चाहिए कि लोग जॉन को अभिनय करते देखना चाहते हैं या केवल उनका शानदार लुक देखना चाहते हैं। इसका मतलब है कि कभी-कभी स्टार फिल्म के लिए बोझ भी बन जाता है।
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