गुंटूर जिले में मौत की आशंका के बीच जीने की ललक रह-रहकर सर उठाती है, जहाँ बड़ी संख्या में एचआईवी पॉजिटिव दंपत्ति संतान सुख के मजे ले रहे हैं।
डॉक्टर कहते हैं कि इसका मुख्य कारण ऐहतियाती उपायों के प्रति जागरूकता और सर्वाधिक महत्वपूर्ण दवा नेवेरपाइन का इस्तेमाल है। नेवेरपाइन माँ से बच्चे के शरीर में होने वाले एचआईवी वॉयरस के संक्रमण को अत्यंत कम कर देती है।
ऐसी ही 24 वर्षीय एक महिला अब एक साल के स्वस्थ बच्चे की माँ है। वह कहती है कि मैंने विवाह तब ही किया जब डॉक्टर ने मुझे बताया कि एचआईवी पॉजिटिव दंपत्ति की संतान सामान्य हो सकती है। मेरे पति भी एचआईवी पॉजिटिव हैं। हम अपने स्वस्थ बच्चे के साथ बेहद खुश है।
पेशे से दर्जी इस महिला से जब पूछा गया कि क्या उसे उसकी बीमारी को लेकर उसके बच्चे के साथ भेदभाव होने की आशंका है तो उसका जवाब था एचआईवी पॉजिटिव होने के कारण जब मेरे साथ और मेरे पति के साथ भेदभाव नहीं हुआ तो मुझे नहीं लगता कि मेरे बच्चे को कोई दिक्कत होगी।
गुंटूर सरकारी अस्पताल के ऑब्स्टेट्रिक्स और गायनेकोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ वसंत कुमार ने कहा कि गर्भवती महिलाओं को नेवेरपाइन लेने का परामर्श दिया जाता है।
आंध्रप्रदेश राज्य एड्स नियंत्रण सोसायटी (एपीएसएसीएस) के सहायक परियोजना निदेशक डॉ. कालिदास ने कहा कि एचआईवी पॉजिटिव गर्भवती महिला की सामान्य संतान होने की संभावना 70 फीसदी होती है।
30 फीसदी मामले में भी देखें तो माँ और बच्चे को नेवेरपाइन देने पर नवजात शिशु में इस बीमारी की आशंका आगे और घटकर मात्र 47 फीसदी रह जाती है।
उन्होंने बताया जिले में एचआईवी की प्रसार दर मात्र तीन फीसदी थी। लेकिन हमें यह कहते हुए गर्व है कि हमने इसे घटा कर एक फीसदी कर दिया है।
गुंटूर जिले में यह परिवर्तन एपीएसएसीएस के अभियान जीरो बाइ सेवन इनीशिएटिव की बदौलत आया है, जिसे जनवरी 2007 में माँ के गर्भ में पल रहे बच्चों को होने वाला एचआईवी का संक्रमण न्यूनतम करने के लिए शुरू किया गया था।
|