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इमाम नहीं बन सकतीं महिलाएँ
महिला मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में नमाज पढ़ाने के हक का समर्थन किए जाने पर देवबंद उलेमाओं ने कड़ी प्रतिक्रिया की है।

यहाँ के उलेमाओं ने कहा है कि एक मुस्लिम महिला नमाज नहीं पढ़ा सकतीं है। यह जायज नहीं है। दारुल उलूम वक्फ देवबंद के फतवा विभाग के उप प्रभारी मुफ्ती अहसान कासमी ने कहा है कि शरीयत के अनुसार महिलाओं द्वारा नमाज पढ़ाना जायज नहीं है। मस्जिद में महिला द्वारा इबादत करना नाजायज है।

दारुल उलूम के दारुल हदीस के मुफ्ती खुर्शीद आलम व मुफ्ती मोहम्मद अरिफ ने भी इसका समर्थन किया है। कासमी ने कहा कि महिलाएँ मस्जिदों में नमाज तो पढ़ सकती हैं लेकिन कुछ परेशानियों के कारण नमाज नहीं पढ़ती हैं।

बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने सउदी अरब का हवाला देकर भारत में भी महिलाओं को यह हक देने का समर्थन किया था। उत्तरप्रदेश इमाम संगठन के अध्यक्ष मुफ्ती जुल्फिकार ने कहा कि महिलाओं को मस्जिदों में नमाज पढ़ने से नहीं रोका गया है। इससे मस्जिदों में इंतजार बढ़ेगा

इसलिए महिलाओं का घरों में ही नमाज अदा करना बेहतर है। महिला का शरीर ढके रहना जरूरी है। मस्जिदों में उनके जाने से गैर पुरुषों की नजर उन पर पड़ेगी जो ठीक नहीं है। जुल्फिकार ने कहा कि शाइस्ता अंबर ने महिलाओं को इमाम बनाने का मुद्दा मीडिया में लोकप्रियता के लिए उछाला है।
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