बिहार में इस वर्ष चार दशकों की रिकार्ड तोड प्रचंड गर्मी और चिलचिलाती धूप के बावजूद राजधानी पटना के विभिन्न इलाकों में हजारों बच्चे दो जून की रोटी तलाशने के लिए कूडे़ का ढेर खँगालने पर मजबूर हैं।
पटना के विभिन्न इलाकों में फटा जांघिया पहने और खुले बदन चिलचिलाती धूप में सुबह से लेकर दोपहर तक ऐसे बच्चों को घूम-घूमकर कूडे़ में मिनरल वॉटर की बोतलें, पोलिथीन बैग, प्लास्टिक का घरेलू सामान रबर के टूटे खिलौने, लोहे का कबाड़ तथा अन्य सामान ढूँढ़ते देखा जा सकता है।
सरकारी स्तर पर बिहार में खतरनाक श्रेणी के कामों में 14 साल से कम उम्र के बच्चों को लगाना गैर कानूनी है, लेकिन इन बच्चों को पेट की आग बुझाने के लिए इससे भी अधिक खतरनाक काम करने पड़ते हैं। राजधानी के कुछ इलाकों का दौरा कर जब इन बच्चों के बारे में जानकारी हासिल की गई तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
तकरीबन पाँच से 13 वर्ष उम्र के अधिकांश बच्चे या तो अपने परिवार में कलह से या अति दयनीय अवस्था के कारण या फिर किसी परिजन की गंभीर बीमारी में पूरी आमदनी के खर्च हो जाने के चलते यह काम करने पर मजबूर हैं। कंकड़बाग टेम्पो स्टैंड के पास झोपड़ी में रहने वाले मिठन कुमार ने बताया कि वह विभिन्न इलाकों में पूरे दिन कूड़ा बटोरने का काम करता है लेकिन जब उसे समुचित मात्रा में सामान नहीं मिलता तो वह भीख माँगने में भी हिचकिचाहट महसूस नहीं करता।
राज्य के श्रम आयुक्त कार्यालय सूत्रों ने स्वीकार किया कि व्यापक स्तर पर इस तरह के बच्चों के पुनर्वास और शिक्षा की व्यवस्था के लिए कई योजनाए चलाई जा रही है, लेकिन इसके बावजूद पारिवारिक मजबूरी और अन्य कारणों के चलते ये बच्चे राजधानी में कूड़ा बीनते देखे जाते है।
सूत्रों के अनुसार वर्ष 2001 में राज्य में बाल श्रमिकों की संख्या करीब ग्यारह लाख 17 हजार थी, लेकिन अब यह बढ़कर तकरीबन 18 लाख हो गई है जिनमें से अधिकांश बच्चे स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़ चुके हैं।
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