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नक्सलियों के आतंक से गाँव की दुर्दशा
बस्तर संभाग में आसपास के क्षेत्रों के लिए आर्थिक समृद्धि एवं संपन्नता का प्रमुख केन्द्र गंगालूर कस्बा पिछले तीन वर्षों से नक्सल विरोघी सलवा जुडूम आंदोलन की शुरूआत के पश्चात से दुर्दिन की मार झेल रहा है।

यहाँ के अधिकांश निवासी नक्सली आतंक के कारण राहत शिविरों में रहने के लिए मजबूर हैं। इस अवधि से खेतों में एक बार भी फसल नहीं ली जा सकी है। जो अपने घरों में रह रहे हैं, उसका कारण भी पैतृक निवास के प्रति मोह है।

इस गाँव में पारंपरिक कार्यक्रम व शादी- ब्याह तक किया जाना सुरक्षित नहीं रह गया है। इन परिवारों के लोगों ने भी गंगालूर का मोह त्याग कर अन्यत्र बसने की मानसिकता बना ली है।

मूलभूत सुविधा के अभाव तथा शून्य आजीविका से लोगों का जीवन संकट में है। उस पर हर पल नक्सली आतंक का साया उनका दर्द बढ़ा रहा है। गाँव के पूर्व सरपंच लीलैया झाड़ी, जो एक उन्नत कृषक रहे है ने बताया कि अपनी 30 एकड़ जमीन से वह इतनी फसल हर साल पाता था कि साल भर के लिए घर की जरूरत पूरी करने के बाद भी 35-40 हजार रूपए का अनाज विक्रय करता था, पर आज पिछले तीन वर्ष से उसके खेत सूखे पडे़ हैं।

ग्रामीणों की आमदनी का अब कोई जरिया ही नहीं बचा है। जब से सलवा जुडूम अभियान चला है तब से यहाँ का साप्ताहिक बाजार यह बताते हुए सरकार ने बंद करा दिया है कि वहाँ नक्‍सलियों का आना-जाना लगा रहता है। यह बाजार यहाँ की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हुआ करता था।
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