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पुरातन स्वरूप खो रही हैं काशी की गलियाँ
बाबा विश्वनाथ, मंदिर, घाटों एवं अन्य मंदिरों के लिए मशहूर उत्तरप्रदेश की धार्मिक नगरी कही जाने वाली काशी की गलियाँ आधुनिकता एवं व्यावसायिकता के चलते अपना पुरातन स्वरूप खोती जा रही हैं।

बढ़ती आबादी एवं व्यावसायिकता का वर्चस्व कायम होने के कारण इन गलियों के बुनियादी ढाँचे में भी परिवर्तन किए जा रहे हैं। कहीं-कहीं तो इनका मौलिक रूप ही विलुप्त हो गया है।

बढ़ते अतिक्रमण ने इन गलियों को और सँकरा बना दिया है। इसका उदाहरण है काशी विश्वनाथ मंदिर की गली जहाँ पर लोगों का चलना मुश्किल हो गया है।

बनारस की गलियों का इतिहास भी उतना ही पुराना है जितनी पुरानी काशी है। इन गलियों में जहाँ किसी समय वेद की ऋचाएँ, भजन-कीर्तन एवं राम चरितमानस का पाठ गूँजता था वहीं उनका स्थान अब भौड़े एवं अश्लील गीतों ने ले लिया है।

इन्हीं गलियों में कभी हिन्दी के युग प्रवर्तक साहित्यकार भारतेन्दु हर‍िश्चंद्र ने अपनी साहित्य यात्रा का श्रीगणेश किया था तो महाकवि जयशंकर प्रसाद को काव्य का प्रसाद भी इन गलियों से ही मिला था।

इन्हीं गलियों ने अंग्रेजों के होश गुम कर दिए थे। काशी की भौतिक संरचना में स्नायुतंत्र की तरह फैली हुई गलियों के कोने में जज्ब है इस शहर का समूचा इतिहास।

इन्हीं गलियों में आज भी लाखों-करोड़ों रुपए का रोज व्यवसाय होता है। सुप्रसिद्ध बनारसी साड़ियों का काम इन्हीं गलियों से होता है। इन गलियों में बहुमंजिले भवनों की भरमार है।

देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा विश्वनाथ, अन्नपूर्णा एवं बाबा कालभैरव समेत अनेक प्राचीन एवं नामी मंदिर इन्हीं गलियों में मौजूद हैं, जहाँ पर पहुँचने के लिए पैदल जाने के अलावा कोई साधन नहीं है। मरने के बाद महाश्मशान मणिकर्णिका पर पहुँचने के लिए भी इन्हीं गलियों से होकर गुजरना पड़ता है।

वाराणसी में एक ओर जहाँ लोग धूप एवं गर्मी से त्रस्त हैं, वही इन गलियों में रहने वाले लोग कूलर का मजा ले रहे हैं। गर्मी एवं लू का भी इन गलियों पर कोई असर नहीं पड़ता। इन गलियों में हमेशा तरावट और ठंड रहती है।

इन गलियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये गंगा के घाटों से जुड़ी हैं। गंगा स्नान करने वाले इन्ही गलियों से होकर रोज घाटों पर जाते हैं। दुनिया का कोई ऐसा सामान नहीं जो इन गलियों में न मिले।

इन गलियों में विदेशी सैलानी भी भ्रमण करते मिल जाते हैं। अब तो यहाँ बड़े-बड़े रेस्टोरेंट एवं होटल खुल गए हैं, जहाँ पर बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। इन गलियों में संगीत एवं योग सिखाने वाले भी रहते हैं।

अब तो स्थिति यह है कि लोगों ने अपने घरों में रेस्टोरेंट एवं साइबर कैफे खोल रखे हैं। दशाश्वमेध के बंगाली टोला से लेकर हर‍िश्चंद्र घाट तक दर्जनों साइबर कैफे खुल गए हैं जहाँ पर विदेशी पर्यटक कम्प्यूटर पर बैठे रहते हैं।

इन गलियों में जहाँ तमाम खूबियाँ हैं वहीं इनमें तमाम गलत काम भी होते हैं। इनमें अफीम, चरस समेत तमाम मादक द्रव्यों का धंधा भी होता है।

वाराणसी के लोगों का मानना है कि काशी की इन गलियों में 'मिनी भारत' बसता है। किसी गली में मराठियों की आबादी है तो किसी में गुजरातियों एवं मद्रासियों की। आन्ध्रप्रदेश एवं तमिलनाडु के लोगों का यहाँ अलग ही मोहल्ला बसा है।
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