उपन्यासकार डोमेनिक लापियर ने कहा है कि उन्हें मिलने वाला पद्मभूषण पुरस्कार दरअसल सुंदरबन के लोगों द्वारा उन्हें दी गई सौगात है। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल सोमवार को उन्हें राष्ट्रपति भवन में इस पुरस्कार से सम्मानित करेंगी। दक्षिणी 24 परगना के इस कस्बे में लगभग हर साल आने वाले लापियर ने यहाँ एक जनसम्मान समारोह में कहा कि सुंदरबन के लोगों से मैं प्यार करता हूँ, उसी के बदले में यह उन लोगों का उपहार है।
यह 27 साल पहले की बात है जब मैं पहली बार ब्रदर गेस्टन दयानंद के साथ यहाँ आया था और उसके बाद इन्हीं लोगों में शामिल होकर रह गया। लापियर ने कहा जब मैं फ्रांस से यहाँ आया तो बहुत थकाऊ-सा लगा, लेकिन जब लौट गया तो यहाँ के लोगों से जो मुझे प्यार मिला उसने मुझे नए सिरे से सोचने और काम करने के लिए प्रेरित किया। उसके बाद मैंने यहाँ दोबारा आने के बारे में सोचा। समारोह में उनकी पत्नी भी उनके साथ थीं। लापियर अपने प्रसिद्ध उपन्यासों सिटी ऑफ ज्वाय तथा अ थाउसेंड संस से मिलने वाली रायल्टी को तपेदिक से पीड़ित मरीजों के इलाज में खर्च करते हैं। इन मरीजों में अधिकतर रिक्शा चालक और बीड़ी कामगार हैं। इलाज का काम गैर सरकारी संगठन साउथर्न हेल्थ इम्प्रूवमेंट सोसायटी द्वारा किया जाता है। इसी संगठन ने लापियर के सम्मान में समारोह आयोजित किया था।
लापियर ने कहा कि सुंदरबन के लोग बहुत-सी समस्याओं का सामना कर रहे हैं जिनमें शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी तथा अन्य सामाजिक समस्याएँ शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इन समस्याओं के समाधान के लिए जनता को खुद जनप्रतिनिधियों, मंत्रियों और सरकार को अवगत कराना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं मदद कर रहा हूँ और यदि सरकार आगे आए तो कोई समस्या ही नहीं रहेगी। एसएचआईएस जैसे गैर सरकारी संगठनों को महिलाओं पर अत्याचार जैसी सामाजिक समस्याओं को समाप्त करने के लिए काम करना चाहिए। लापियर ने कहा कि मैं जब तक जिंदा हूँ सुंदरबन के लोगों के लिए काम करता रहूँगा। जब मैं जिंदा नहीं रहूँगा तो मेरी रायल्टी और मेरे मित्र मेरे काम को जारी रखेंगे। लापियर अपने साथ कोलकाता के रिक्शा चालकों द्वारा दी गई एक घंटी को हमेशा रखते हैं। वे कहते हैं यह घंटी हमेशा मेरे साथ रहती है। यह मुझे आगे बढ़ने का साहस देती है। उनके उपन्यास सिटी ऑफ ज्वाय का नायक गरीब रिक्शा चालक हंसारी पाल है। इसी उपन्यास पर फिल्म भी बनाई गई है।
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