लोगों को तारने वाली गंगा का अस्तित्व संकट में है। धार्मिक नगरी काशी में पानी का बहाव कम होने एवं प्रदूषण के चलते गंगा की स्थिति काफी खराब हो गई है। दूसरों को मोक्ष दिलाने वाली गंगा अब स्वयं मोक्ष को तरस रही है।
अब तो वाराणसी में गंगा में जहाँ-तहाँ बालू के टीले दिखाई देने लगे हैं। कई पक्के घाटों को गंगा छोड़ चुकी है। केवल मिट्टी का टीला नजर आ रहा है। रामनगर से राजघाट के बीच बालू खनन पर रोक लगने के कारण रेत का मैदान बढ़ता जा रहा है और गंगा सिमटती जा रही है।
स्थिति यह है कि काशी के विश्व प्रसिद्ध घाटों पर पानी कम होने से स्नानार्थी घुटनेभर या उससे भी कम एवं प्रदूषणयुक्त पानी में डुबकी लगाने को बाध्य हैं।
गंगा में व्याप्त प्रदूषण का तो यह हाल है कि स्थानीय लोगों ने गंगा स्नान करना लगभग छोड़ ही दिया है। काशी के घाटों पर बैठने वाले पंडों को डर है कि कहीं गंगा का भी वही हाल न हो जो यमुना, गोमती तथा अन्य नदियों का हुआ है।
प्रयाग और इलाहाबाद में तो गंगा इन दिनों नदी की जगह नाला बन गई है। वहाँ पर गंगा एवं यमुना का जलस्तर 10 प्रतिशत के हिसाब से हर साल गिरता जा रहा है। पाप नाशिनी गंगा अब कानपुर एवं इलाहाबाद में गंदे नाले के रूप में परिवर्तित हो दीन-हीन बन गई है।
गत सोमवार को इलाहाबाद से समाजवादी पार्टी सांसद कुँवर रेवती रमणसिंह ने गंगा की दुर्दशा पर संसद में सवाल उठाते हुए चेतावनी दी थी कि यही हाल रहा तो वर्ष 2030 तक गंगा मृत नदी बन जाएगी। वाराणसी में लोगों का मानना है कि उनकी इस आशंका को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
आगरा तथा दिल्ली में यमुना, लखनऊ में गोमती, वाराणसी एवं इलाहाबाद में वरुणा और जौनपुर में सई एवं पीली नदियों का क्या हश्र हुआ है यह किसी से छिपा नहीं है।
पर्यटन से जुडे़ लोगों का मानना है कि प्रतिवर्ष लाखों विदेशी पर्यटक अन्य स्थानों को देखने के साथ ही साथ वाराणसी में गंगा के सुप्रसिद्ध घाटों को देखने आते हैं। दुनिया में किसी भी नदी के किनारे इतने सुन्दर घाट देखने को नहीं मिलते।
देश को इससे अरबों रुपए की विदेशी मुद्रा अर्जित होती है। इन घाटों का अस्तित्व गंगा के अस्तित्व से जुड़ा है। बिना गंगा के इन घाटों का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा।
सबसे ज्यादा चिंतित गंगा के किनारे रहने वाले नाविक हैं, जिनकी जीविका का साधन गंगा है। कानपुर, इलाहाबाद एवं वाराणसी में नालों का गंदा पानी बेरोकटोक गंगा में गिर रहा है। वाराणसी में प्रदूषण के चलते गंगा का पानी काला पड़ गया है।
गंगा सेवा निधि के संस्थापक अध्यक्ष सत्येन्द्र मिश्रा का कहना है कि गंगा की आज जो स्थिति है वैसी पहले कभी नहीं थी। पानी का बहाव कम होने से गंगा का फैलाव दिनोदिन घटता जा रहा है। बहाव न होने से प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। जब तक टिहरी बाँध से पर्याप्त पानी नहीं छोड़ा जाएगा गंगा का न तो जलस्तर बढे़गा और न ही बहाव।
बाढ़ नियंत्रण के अधिशासी अभियंता उमेश शर्मा का कहना है कि अगर आने वाले समय में पर्याप्त वर्षा न हुई तो दोनों पवित्र नदियों गंगा एवं यमुना का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। दोनों नदियों का जलस्तर 10 प्रतिशत के हिसाब से प्रतिवर्ष घट रहा है।
दो दशक पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गाँधी द्वारा गंगा को प्रदूषणमुक्त करने के लिए गंगा एक्शन प्लान शुरू किया गया था। इस पर सरकार ने 50 करोड़ से ज्यादा रपुए खर्च किए थे, लेकिन गंगा के जल में सुधार होने के बजाय स्थिति बद से बदतर हुई है।
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