व्यावसायिक फसलें को उगाने का चलन तेजी के साथ बढ़ने से पहाड़ों की परंपरागत खेती का स्वरूप बिगड़ता जा रहा है।
कहीं लोग मटर ही मटर उगा रहे हैं तो कहीं टमाटर ही टमाटर तथा कहीं आलू ही आलू तो कहीं सोयाबीन ही सोयाबीन। यहाँ तक कि अब लोग सूरजमुखी और फूलों की खेती भी करने लगे हैं। इससे लोगों के पास थोड़ा-बहुत पैसा तो आ जाता है, लेकिन खाद्यान्न तो उन्हें बाजार से खरीदने पड़ते है, जो अक्सर कीटाणुनाशकों से सने तथा महँगे होते है।
पहाड़ों की परंपरागत मंडुए की रोटी, चौलाई का हलुवा, गथ्वाणी, भटवाणी, चुणकानी, चैंसा और फाणा आदि व्यंजन अब बहुधा उपलब्ध नहीं होते, लेकिन सुदूर पहाड़ी गाँवों में लोग अब भी इन्हें चाव से खाते हैं।
बीज आन्दोलन से जुड़े़ लोगों के अनुसार आधुनिक बाजार और विज्ञान इस पारंपरिक खेती को ध्वस्त करने की कोशिश कर रहे हैं। परंपरागत प्रणाली में सिर्फ गेहूँ तथा धान ही अकेले उगाए जाते हैं, जबकि बाकी फसलों को एक साथ खेत में बोया जाता है। मंडुए के साथ उगने वाला बारहनाजा (बारह अनाज) पौषकता के लिए तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही इससे भूमि की उर्वरक शक्ति भी बरकरार रहती है।
बारहनाजे में मंडुए के अलावा चौलाई, ओगल, ज्वार, राजमा, उड़द, गहत, भट्ट, लोबिया, नौरंगी, तिल, भंगजीर व तथा जखिया आते हैं। पोषण की दृष्टि से इन फसलों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है।
पहले वर्ग में मंडुआ, चौलाई, ओगल और ज्वार आते हैं जिन्हें मूल आहार कहा जा सकता है। इन्हें रोटी बनाकर खाया जाता है तथा कार्बोहाईड्रेट इनका प्रमुख घटक है जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है इसमें अनेक खनिज लवण और विटामिन भी होते हैं।
मंडुए से कैल्शियम तथा फासफोरस भी मिलते हैं जो हड्डियों और दाँतों की मजबूती के लिए जरूरी हैं। मंडुए में कैल्शियम और फासफोरस लगभग संतुलन की स्थिति में रहते है। इसलिए शरीर उनका अवशोषण आसानी से कर लेता है। इसमें लौहतत्व भी पर्याप्त मात्रा में होता है जो रक्त निर्माण में सहायता करता है।
इसमें आयोडीन भी अन्य अनाजों के मुकाबले अधिक होता है, जिससे गलगंड या घेंघा रोग से बचाव होता है। मगर इसमे ट्रिप्टोफेन, लाइसीन, हिस्टीडीन, फेनिलएलेनीन, अर्जिनीन सिस्टीन तथा मथिओनीन नामक जो अमीनों अम्ल होते हैं वे मनुष्य के जिंदा रहने के लिए बहुत ही आवश्यक हैं। यही वजह है कि पुराने जमाने में जो बच्चे कमजोर होते थे उन्हे मंडुए का रस पिलाया जाता था।
ओगल और चौलाई भी कई प्रकार के महत्वपूर्ण पोषक तत्वों से भरपूर हैं। इनमें लौहतत्व की काफी मात्रा होती है और इनके प्रोटीनों में कई जरूरी अमीनो अम्ल मौजूद रहते हैं।
दूसरे वर्ग में राजमा, उड़द, गहत, लोबिया तथा नौरंगी जैसी दलहनी फसलें आती हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रोटीन का मुख्य स्रोत हैं प्रोटीन शरीर की वृद्धि में सहायक होते हैं तथा क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत करते हैं।
इस दृष्टि से राजमा बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसमें रेशा बिल्कुल नहीं होता इसलिए पचाने में यह थोड़ा कठिन होता है। लेकिन इसमें जितने रंग, रूप और स्वाद है उतने धान के अलावा किसी दूसरी फसल में नही हैं इसलिए यह रंगों से पहचाना जाता है तथा उत्पादन क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। मसलन चकराता, हरसिल, उर्गम घाटी तथा मुन्स्यारी आदि का राजमा। लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों के राजमा का स्वाद भी अलग-अलग होता है।
गहत या कुलथ में ज्यादा विविधता नहीं है लेकिन पोषण की दृष्टि से यह भी बेहद महत्वपूर्ण दाल है। सभी दालों के मुकाबले इसमें रेशा आधिक रहता है इसलिए पचने में आसान रहती है। जाड़े में लोग इसका गथ्वाणी खाते हैं, जिससे ठंड पास नहीं फटकती। अगर कई दिनों तक गथ्वाणी निरंतर खाया जाए तो शरीर में पथरी बाहर निकल आती है।
पुराने जमाने में जब डायनामाइट का चलन पहाड़ों में ज्यादा नहीं हुआ था तब लोग इसका उपयोग खेतों के पत्थर तोड़ने में करते थे। रात-रात पत्थर के नीचे आग जला कर रखते थे और सुबह-सुबह गरम पत्थर पर गथ्वाणी डालते थे तो वह दरक जाता था। मंडुए की तरह यह भी कैल्शियम और फास्फोरस का मुख्य स्रोत है।
लौहतत्व तथा विटामिन-ए भी इसमे थोड़ा-बहुत रहता है। मजेदार बात यह है कि गहत ऊबड़-खाबड़ और पथरीली जमीन में अच्छा होता है परंतु बाजार में यह बासमती के बराबर दोमों में बिकता है।
|