उत्तरप्रदेश सरकार के नागरिक उड्डयन विभाग को अब सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 से बाहर कर दिया गया है। इसके लिए बाकायदा सरकार ने अधिसूचना भी जारी कर दी है।
उल्लेखनीय है कि करोड़ों रुपए के घोटालों के चलते तथा वीवीआईपी की सुरक्षा में सुराख होने के कारण राज्य के अनेक लोगों ने सूचना के अधिकार के तहत जब राज्य उड्डयन निदेशालय की हकीकत जाननी चाही तो सरकार ने इसे सूचना के अधिकार अधिनियम से ही बाहर कर दिया।
मालूम हो कि उत्तरप्रदेश सरकार के नागरिक उड्डयन अनुभाग ने संख्या-254/छप्पन-2008-15-05 दिनांक-25 मार्च, 2008 की अधिसूचना के तहत उत्तरप्रदेश सरकार के नागरिक उड्डयन विभाग को सूचना के अधिकार अधिनियम से बाहर रखा गया है। कहा गया है कि उत्तरप्रदेश के नागरिक उड्डयन विभाग की परिचालन इकाई तथा अनुरक्षण, सुरक्षा एवं सामान्य प्रशासन इकाई राज्य सरकार द्वारा स्थापित सुरक्षा संगठन है क्योंकि यह अन्य बातों के साथ-साथ राज्य के मंत्रियों और उच्च अधिकारियों, जिनकी सुरक्षा की विशेष सावधानियों की आवश्यकता होती है, के परिवहन के लिए सरकारी विमानों के परिचालन तथा अनुरक्षण का कार्य करता है। अतएव अब सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 (अधिनियम संख्या-22 सन 2005) की धारा 24 की उपधारा (4) के अधीन शक्ति का प्रयोग करके राज्यपाल, राज्य सरकार के उक्त नागरिक उड्डयन विभाग की उक्त इकाइयों अर्थात परिचालन इकाई तथा अनुरक्षण तथा सुरक्षा एवं सामान्य प्रशासन इकाई को जिन पर उक्त अधिनियम के उपबंध लागू नहीं होंगे, विनिर्दिष्ट करते हैं। उत्तरप्रदेश नागरिक उड्डयन विभाग में वर्ष 1989 में राजकीय विमानों की खरीद-फरोख्त एवं बिक्री में हुए गोलमाल, राजकीय विमानों की उड़ानों के दुरुपयोग के संबंध में उच्च स्तरीय जाँच रिपोर्ट की प्रति प्राप्त करने के संबंध में जब स्थानीय पत्रकार एवं जनाधिकार संगठन के सक्रिय कार्यकर्ता अजय दीक्षित ने सूचना के अधिकार के तहत मुख्य सचिव से सूचना माँगी तो उन्होंने कोई सूचना नहीं उपलब्ध कराई।
मामला राज्य सूचना आयोग जा पहुँचा। नियत तिथि पर मुख्य सचिव या उनके जनसूचना अधिकारी की जगह नागरिक उड्डयन विभाग के विशेष सचिव देवेन्द्र स्वरूप की तरफ से उपस्थित अधिवक्ता ने वादी को लिखित रूप से सूचित किया कि चूँकि प्रश्नगत पत्र नागरिक उड्डयन विभाग से संबंधित है इसलिए सूचित किया जाता है कि नागरिक उड्डयन विभाग पर सूचना अधिकार अधिनियम के उपबंध लागू नही होंगे अतः याचिका खारिज कर दी जाए।
यह भी कि केन्द्रीय सरकार ने सिर्फ नागरिक उड्डयन अनुसंधान केन्द्र को सूचना के अधिकार से बाहर रखा है। वादी की इस दलील पर सूचना आयुक्त सुभाष पांडेय ने अगली तिथि नियत कर वादी से जवाब माँगा है।
सूचना माँगने पर मिली अधिसूचना : उल्लेखनीय है कि वादी ने राजकीय उड्डयन विभाग की एक गोपनीय रिपोर्ट की माँग की थी। यह रिपोर्ट बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि रिपोर्ट में इस विभाग के मुखिया पर गम्भीर आरोप लगाए जाने की जाँच की गई थी। सूत्रों ने बताया कि राजकीय उड्डयन विभाग के मुखिया पर राजकीय विमानों की खरीद-फरोख्त में करोड़ों का घोटाला करने, राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहने, विदेशी महिला को सीमा पार कराने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। कहा जाता है कि इन आरोपों की उच्च स्तरीय जाँच तीन सदस्यीय समिति ने की थी। इतने गंभीर आरोपों की जाँच के आदेश किसने दिए, जाँच समिति की अध्यक्षता किसने की, जाँच समिति में कितने सदस्य थे, जाँच समिति की रिपोर्ट क्या थी। इसी जाँच रिपोर्ट की प्रति वादी अजय दीक्षित ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत सरकार से माँगी थी। सरकार ने सूचना देना तो दूर उल्टे सरकार की अधिसूचना थमा दी, जिसमें कहा गया है कि राजकीय उड्डयन निदेशालय सूचना के अधिकार की परिधि में ही नहीं आता।
मजेदार बात यह है कि वादी ने जब प्रश्न पूछा था तब तक इस तरह की कोई अधिसूचना जाहिर नहीं हुई थी किन्तु जब से इस विभाग के आका, जिसे मुख्यमंत्री ने कैबिनेट सचिव बना दिया था उनके अधिकारों में कटौती हुई उसी के बाद इस अधिसूचना का अस्तित्व प्रकाश में आया है।
जनाधिकार संगठन के अध्यक्ष अशोक शंकरम का कहना है कि गोपनीय या सुरक्षा इकाई नहीं है राजकीय उड्डयन विभाग। उन्होंने कहा कि यदि कोई अधिसूचना षड्यंत्र के तहत सरकार ने जारी की है जिससे भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की कोशिश प्रतीत होती है तो इस तरह की अधिसूचना सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 24 (4) के तहत अप्रभावी मानी जाएगी। सरकार सूचना उपलब्ध कराने को बाध्य है।
हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सूचना के कानून के जानकार एडवोकेट गिरीश कुमार पांडेय का कहना है कि सरकार इस मामले मे सूचना उपलब्ध कराने में आनाकानी कर रही है ताकि सत्ता शीर्ष के भ्रष्ट अधिकारियों को बचाया जा सके किन्तु ऐसा होने नहीं दिया जाएगा।
|