याब छुतुप को 1961 में मजबूर होकर तिब्बत छोड़ना पड़ा था, लेकिन आज 66 बसंत देखने के बावजूद उनमें अपने वतन लौटने और वहाँ फिर से घर बसाने की ललक वैसी ही है, जैसी 48 साल पहले थी। भारत में रह रहे एक और तिब्बती शरणार्थी इकतालीस वर्षीय छोगयाल सिर्फ इतना जानते हैं कि तिब्बत में उनके चाचा रहते हैं, जिनका नाम दोरजे नामग्याल है। उन्हें यह पता नहीं है कि वह तिब्बत पर चीन के आधिपत्य के बाद कैसी स्थिति में रह रहे हैं, लेकिन उनकी आशाएँ खत्म नहीं हुई हैं। छोगयाल को भरोसा है कि एक दिन वह अपने चाचा से जरूर मिलेंगे।
यह सिर्फ छुतुप या छोगयाल की नहीं बल्कि भारत में शरणार्थियों के रूप में रह रहे लगभग डेढ़ लाख तिब्बतियों की कहानी है, जिन्होंने एक न एक दिन अपने 'आजाद वतन' में लौटने की आस में भारतीय नागरिकता नहीं ली है। फिलहाल लद्दाख की राजधानी लेह में रह रहे छुतुप ने तो कभी भारत की नागरिकता लेने के बारे में सोचा ही नहीं। उन्होंने कहा कि भारत और भारतीयों से हमें बहुत प्यार मिला, लेकिन हम यहाँ की नागरिकता नहीं लेना चाहते हैं। हम शरणार्थी बनकर आए थे और अपना देश वापस चाहते हैं।
छुतुप यहीं पर नहीं रुकते। अपनी टूटी-फूटी हिन्दी या दुभाषिए के माध्यम से उन्होंने अपना दुख बाँटने में कोई कोताही नहीं बरती। उन्होंने कहा- भारतीय सरकार शरणार्थियों के साथ अच्छा व्यवहार कर रही है, लेकिन तिब्बत में जो अत्याचार हो रहा है, उस पर उसे चुप नहीं बैठना चाहिए।
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