महानगर मुंबई कभी नहीं सोता और इसके निवासी भी भागमभागभरी जिंदगी में सारी रात बिस्तरों में करवटें बदलते हुए गुजारते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जीवनचर्या में बदलाव और देर रात काम करने के कारण अब बच्चे भी अनिद्रा के बीमारी की शिकायत करने लगे हैं।
लोकमान्य सेवा संघ के मनोचिकित्सक मनोज भाटवाडे़कर और गैर सरकारी संस्था 'किशोर डायबिटीज फाउंडेशन' इस बीमारी का कारण सोने के लिए नहीं मिलने वाले उपयुक्त परिवेश को जिम्मेदार मानते हैं।
उन्होंने कहा कि हम सोने के लिए अच्छी आदतें अपनाने की सलाह देते हैं, मसलन बिस्तर पर देर से जाने के बावजूद एक निश्चित समय पर जागना, सोने से पहले स्फूर्तिदायक चीजों से बचना, बिस्तर का इस्तेमाल सिर्फ सोने के लिए करना और जब नींद आए तभी बिस्तर पर जाना आदि शामिल हैं।
इस कड़ी में यहाँ महीनेभर जागरूकता कार्यक्रम चलाया गया, जिसमें फिजिशियन और विशेषज्ञों को बताया गया कि बिना दवा के अनिद्रा की समस्या से कैसे निजात पाई जाए।
बच्चों के बारे में उन्होंने कहा कि बच्चों को वयस्कों की तुलना में ज्यादा नींद लेने की जरूरत होती है, लेकिन स्कूल जाने के अलावा उनकी दिनचर्या काफी व्यस्त होती है। यहाँ तक कि बच्चे देर से बिस्तर पर जाते हैं और उन्हें जल्दी उठना पड़ता है।
भाटवाडे़कर ने अभिभावकों और विद्यार्थियों को सलाह देते हुए कहा कि कम निद्रा के कारण ज्यादातर बच्चों की एकाग्रता भंग होती है और ऐसे कई केस हमारे सामने आ रहे हैं। यहाँ तक कि हताशा और और दूसरी बीमारियों से ग्रस्त रोगियों को भी चिकित्सक सोने की विधियों के बारे में बताते हैं।
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