इसी के तहत न्यास ने मंदिर के बगल में स्थित ताड़केश्वर मंदिर एवं रानी भवानी भुवनेश्वर मंदिरों के परिसरों को काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में समाहित करने का काम हाथ में लिया।
उन्होंने बताया कि नए मंदिर परिसर में जहाँ ताड़केश्वर शिव मंदिर परिसर को समाहित किए जाने का कार्य लगभग पूर्ण हो गया है वहीं रानी भवानी भुवनेश्वर के शिव मंदिर के परिसर को भी इसमें समाहित कर लिया गया है। अब सिर्फ इसके गर्भगृह को इसमें पूरी तरह समाहित किए जाने का कार्य शेष है। दीवारों पर संगमरमर लगाए जाने का काम प्रारंभ किया गया है और इसे तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि इन दोनों प्राचीन शिव मंदिरों का क्षेत्रफल लगभग छह हजार वर्ग फुट है और दोनों के समाहित होने से काशी विश्वनाथ मंदिर का लगभग 2700 वर्ग फीट का प्राचीन परिसर अब लगभग साढे़ आठ हजार वर्ग फीट का हो गया है। इस पर करीब 1 करोड़ 51 लाख रुपए खर्च हुए है।
उन्होंने बताया कि यह सारा कार्य इस वर्ष जून तक पूर्ण हो जाने की संभावना थी लेकिन आवश्यक सफेद संगमरमर की उपलब्धता में कठिनाई के चलते इसमें कुछ समय और लगने की संभावना है। दीवारों पर संगमरमर लगाए जाने का काम प्रारंभ किया गया है और इसे तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है।
गोकर्ण ने बताया कि मंदिर के नए परिसर की फर्श और दीवारों पर सफेद संगमरमर के पत्थर लगाए जा रहे हैं और दीवारों पर लगाए जाने वाले संगमरमर के पत्थरों पर भगवान शिव की आराधना के श्लोक उत्कीर्ण किए जा रहे हैं। इसके अलावा दीवारों के पत्थरों पर भगवान शिव माहात्म्य से जुड़ी कथाओं के चित्र भी बनाए जाएँगे।
परिसर के विस्तारित हिस्से में प्राचीन मंदिर की वास्तु के अनुरुप शिलाओं पर कला उकेरी गई है। नए परिसर के खंभे और दीवारें चुनार के पत्थरों से बनी हैं और इस कार्य में राजस्थान एवं देश के अनेक हिस्सों से आए सैकड़ों शिल्पी दिन-रात लगे रहे। नए मंदिर परिसर को देखने से लगता है कि यह प्राचीन मंदिर की कला और स्थापत्य की पूरी तरह प्रतिकृति प्रतीत होती है।
प्राचीन मंदिर के शिखर पर महाराजा रणजीतसिंह ने उन्नीसवीं सदी में लगभग दस क्विंटल सोने की परत चढ़वाई थी और उसके शिखर के अनुकूल ही नए परिसर में शामिल किए गए दो मंदिर शिखरों को बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
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