पूजा अर्चना और विश्वास के भी विचित्र कायदे होते हैं। केरल के कोल्लम जिले के पोरुवाझी मंदिर में भारतीय महाकाव्य महाभारत के खलनायक दुर्योधन इष्ट देवता हैं।
दलित मंदिर होने के बावजूद यहाँ हिंदुओं के सभी वर्गों के लोग पूजा करने आते हैं। मंदिर ने वैसे तो हिंदुओं के मुख्यधारा के कई रिवाज वर्षों से अपना रखे हैं, लेकिन पूजा और अन्य कर्मकांड अब भी दलित कौरव समुदाय के लोगों द्वारा ही किए जाते हैं।
आदिवासी परंपरा को कायम रखने के लिए यहाँ भगवान को ताड़ी, मुर्गा आदि चढ़ाया जाता है। मंदिर के उतराधिकारी मानते हैं कि यह जगह दुर्योधन की यात्रा के बाद ही पवित्र हुआ था।
दलित उन्हें मलानदा, अपोपन या पर्वतों के देवता मानते हैं। केरल के मंदिरों की अच्छी जानकारी रखने वाले प्रो. एमजी शशिभूषण ने कहा कि मूल रूप से इस जगह पर कौरव समुदाय के लोग अपने पूर्वजों की पूजा करते होंगे, जिसे बाद में स्थानीय समुदाय के सभी लोगों ने भी अपना लिया होगा।
ऐसे कई मंदिर हैं जहाँ इस तरह की पौराणिक परंपराएँ हैं। शशिभूषण ने कहा कि महाभारत में दुर्योधन के निर्देश पर पांडवों के लिए लाक्षागृह बनाने वाले मलयन कौरव समुदाय के पूर्वज थे।
शास्त्रों के अनुसार खलनायक माने जाने वाले चरित्र की पूजा करने के पीछे के तर्क पर शशिभूषण ने कहा कि धर्म और विश्वास के विषय में कभी कभी व्याख्या करना काफी मुश्किल होता है।
मंदिर में 'दुर्योधन' की कोई मूर्ति नहीं है। वहाँ सिर्फ ग्रेनाइट का एक चबूतरा है जहाँ दुर्योधन की उपस्थिति मानकर पूजा की जाती है। मंदिर में भगवान गणेश व दूसरे देवताओं की मूर्तियाँ भी लगी हुई हैं, लेकिन दुर्योधन की पूजा के बाद ही इन देवताओं की पूजा की जाती है।
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