प्रतापगढ़ जिले के गंगा नदी के उत्तरी तट पर स्थित 800 वर्षों पुराना जीर्ण शीर्ण राजा मानिकचंद का किला एक बार फिर देश-विदेश के पर्यटकों और इतिहासकारों को अपनी ओर आकर्षित करेगा क्योंकि अब इसके रखरखाव की जिम्मेदारी पर्यटन विभाग ने संभाल ली है।
इस ऐतिहासिक किले को फिर से सजाने-सँवारने के लिए पर्यटन विभाग ने एक करोड़ 36 लाख रुपए की एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई है, जिसके लिए प्रथम चरण मे शासन द्वारा 50 लाख रुपए पर्यटन विभाग को दे दिए गए हैं।
क्षेत्रीय पर्यटन अधिकार (इलाहाबाद मंडल) आरएन यादव ने बताया कि गंगा नदी तट के घाट के साथ-साथ राजा मानिकचंद के किले के लिए अलीगंज बाजार से निकले सम्पर्क मार्ग का निर्माण, किले के नीचे पार्किग स्थल, यात्री शेड, पेयजल एवं प्रकाश की समुचित व्यवस्था के साथ शहाबाद घाट का निर्माण और सौंदर्यीकरण कराया जाएगा।
सन 1191 के पूर्व जब राजा जयचंद ने कन्नौज से 126 किमी दूर प्रतापगढ़ के मानिकपुर मे गंगानदी के दक्षिणी तट पर 'करा' नामक स्थान पर एक किला निर्मित कराया था तो उसी समय राजा जयचंद के सौतेले भाई राजा मानिकचंद ने उत्तरी तट पर एक किला निर्मित कराया और उसे अपने राज्य की राजधानी घोषित कर दिया था।
इतिहास के पन्ने इस किले की कई सुनहरी यादों को संजोए हुए हैं। बताया जाता है कि विषम परिस्थितियों में राजा पृथ्वीराज की पत्नी और राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता अपने चाचा मानिकचंद्र के इस किले में कई दिनों तक रुकी रहीं, पर राजा जयचंद के अड़ियल रवैये की वजह से राजा मानिकचंद भी उनकी मदद नहीं कर पाए थे। देसी रियासतों में आपसी फूट तथा ईर्ष्या का लाभ उठाते हुए मुगल शासक सैयद शहाबुद्दीन गौरी ने युद्ध में राजा मानिकचंद को परास्त कर इस किले पर अपना शासन स्थापित किया था।
मुगल काल में बादशाह अकबर के आगमन से मानिकपुर किले में रौनक लौट आई थी। इसी किले में औरंगजेब भी 1658 एडी से 1707 एडी के मध्य अवध क्षेत्र का भ्रमण करते हुए ईद का चाँद देखने मानिकपुर आए और फिर यहीं ईद भी मनाई।
इतिहासकारों का मानना है कि ईद का चाँद देखने के बाद बादशाह औरंगजेब को सुबह नमाज अदा करनी थी, जिसके लिए मानिकपुर किले से सटे शहाबुद्दीनाबाद गाँव में सेना के जवानों ने रातों-रात एक मजिस्द तैयार की, जिसका नाम एक शब-ए-मस्जिद पड़ा।
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