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दूरदर्शन भोपाल में मुनअक़िद मुशायरा
इन खूबियोँ के साथ ही आपके अशआर भी काफ़ी अच्छे थे। स्टेज और सामईन दोनों से आपको खूब दाद मिली। मुशायरे में एक बार फिर से ज़िन्दगी पैदा हो गई। आपकी आवाज़ ओ कलाम ने मुशायरे को ताज़गी बख़्शी-

किसी का फूल सा चेहरा छुपा के आँखों में
दिल ओ दिमाग़ में पहरों लड़ाइयाँ देखीं

वो बेसिपाह मेरे क़स्रे दिल पे क़ाबिज़ है
किसी के प्यार की फ़रमारवाइयाँ देखीं

सुकूत में भी सुख़न के हज़ार पहलू हैं
इन आँसुओं की कभी लब कुशाइयाँ देखीं

अब आवाज़ दी गई जनाब अज़ीज़ अंसारी को, आपने मतला पढ़ा-

किसी गली में खुला दिल का दर न था कोई
तमाम शहर में अपना ही घर न था कोई

मतले से ही दाद का दौर शुरू हो गया। ये सिलसिला आ‍खरी शे'र तक क़ायम रहा। जनाब अज़ीज़ अंसारी की पूरी ग़ज़ल खूब सराही और पसन्द की गई। बतौरे ख़ास, इन अशआर पर काफ़ी दाद मिली-

उठाए फिरता रहा जिसको अपने कांधों पर
वो मेरा अपना था बार ए दिगर न था कोई

किसी की याद थी, साग़र था, चान्दनी शब थी
कमी ये थी मेरे कांधे पे सर न था कोई

उस एक ग़म के सहारे ख़ुशी से जी लेता
हज़ारों ग़म थे ग़म ए मोतबर न था कोई

जनाब अज़ीज़ अंसारी के बाद जावरा से तशरीफ़ लाए जनाब साहिर अफ़ग़ानी याद किए गए।

उमड़ती फ़िक्र का सैलाब रोकता कैसे
फ़सील ए जिस्म के अन्दर वो झाँकता कैसे

इसी तरह नए मिज़ाज के अशआर सहर साहब ने सुनाए जो काफ़ी पसन्द किए गए। इनके बाद आवाज़ दी गई जनाब इम्तियाज़ अंजुम को। आपने रिवायती अंदाज़ के उम्दा अशआर अपनी खूबसूरत आवाज़ और मुशायरे के बेहतरीन तरन्नुम में सुनाए और खूब दाद हासिल की।

लुत्फ़ ए साक़ी ही मोयस्सर है न, पैमाना मुझे
किसलिए ठुकरा रहे हैं, एहले मैख़ाना मुझे

इल्म के दरिया में उतरा था, खि़रद के ज़ोम पर
कर दिया इदराक ने ख़ुद से ही बेगाना मुझे

मुशायरा अपने शबाब पर आ चुका है और अब आवाज़ दी जा रही है डॉ. अज़ीज़ इन्दौरी को उम्मीद के खिलाफ़ आपने पुरानी मगर अच्छी ग़ज़ल सुनाई और पसन्द किए गए।

मर्द ए कामिल लक़ब मेरे आँसू
बन गए इक नसब मेरे आँसू

उनके दामन पे तारे टाँक आए
काम के निकले अब मेरे आँसू

डॉ. अज़ीज़ इन्दौरी के बाद आवाज़ दी गई जनाब अख़्तर आसिफ़ बुरहानपुरी को।

आदाब ए बन्दगी का मज़ा हमसे पूछिए
मेराज़ ए आगही का मज़ा हमसे पूछिए

दिल में हज़ार ग़म हैं, लबों पर मगर हँसी
ग़मगीन ख़ुशदिली का मज़ा हमसे पूछिए

क़र्जा नहीं किसी का चले सर उठा के हम
बेबाक ज़िन्दगी का मज़ा हमसे पूछिए

जनाब अख़्तर आसिफ़ के इस कलाम के साथ ही ये महफि़ल ए मुशायरा खत्म हुई। इस मुशायरे में शो'रा का इंतिखाब और दीगर तमाम इनतेज़ामात जनाब साजिद रिज़वी ने बहुस्न ओ ख़ूबी अंजाम दिए। इस मुशायरे को दूरदर्शन भोपाल से 10 मई 2008 को शब में 10 से 11 बजे के बीच देखा और सुना जा सकता है।
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