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दूरदर्शन भोपाल में मुनअक़िद मुशायरा
- अज़ीज़ अंसार

25 मार्च 2008 बरोज़ मंगल, दिन के 11 बजे दूरदर्शन भोपाल में एक मुशायरे का इनएक़ाद किया गया। मुशायरे की निज़ामत मक़बूल शायर जनाब अंजुम बाराबंकवी ने फ़रमाई। मुशायरे में जिन शो'रा ने अपना कलाम पेश किया उनके नाम इस तरह हैं- डॉ. अज़ीज़ इन्दौरी, जनाब अज़ीज़ अंसारी (इन्दौर), जनाब अख़्तर आसिफ़ बुरहानपुरी, जनाब अंजुम बाराबंकवी (भोपाल), जनाब हसन फ़तेहपुरी (भोपाल), जनाब इम्तियाज़ अंजुम (भोपाल), जनाब सहर अफ़ग़ानी गुलशन आबादी, जनाब सफ़दर रज़ा खंडवी, जनाब फ़ैज़ रतलामी, जनाब विनोद नयन जबलपुरी, जनाब अतुल अजनबी ग्वालियरी।
मुशायरे के आग़ाज़ के लिए जनाब अतुल अजनबी को आवाज़ दी गई। आपकी ग़ज़ल का मतला था-
इक थकन क़ुव्वत ए इज़हार में आ जाती है
वक़्त के साथ कमी प्यार में आ जाती ह
मतला पढ़ते ही आपको मुनासिब दाद मिली, दाद का सिलसिला ग़ज़ल के साथ-साथ आगे बढ़ता गया। आपके बाद जनाब विनोद नयन ग़ज़लसरा हुए। आपने दो ग़ज़लों के मुनतखिब अशआर पेश किए। पहली ग़ज़ल का मतला कुछ इस तरह था-
ज़ुल्म ओ ज़ोर का मौसम और ज़ुबाँ पे ताले हैं
रुसवाई-ए-आलम है हम तेरे हवाले है
मुनासिब दाद लेकर आप रवाना हुए। इनके बाद नाज़िम ए मुशायरा ने जनाब हसन फ़तेहपुरी को आवाज़ दी। आप अपनी सुरीली आवाज़ में ग़ज़लसरा हुए-
उन मसाइब में जल रहा हूँ मैं
जिन मसाइब का हल रहा हूँ मैं

मुश्किलों से कहो कमर कस लें
अब सफ़र पे निकल रहा हूँ मैं

आपने इक और ग़ज़ल के चन्द अशआर पढ़े-

दिमाग़ ओ दिल में अगर फ़ासला नहीं होता
तो कोई शख़्स जहाँ में बुरा नहीं होता

ख़ुदा करे कि हर इक शख़्स ये समझ जाए
फ़साद हो तो किसी का भला नहीं होता

हर चन्द के ये मक़ाम आपका नहीं था फिर भी आपको आवाज़ दी गई, शायद नाज़िम ए मुशायरा महफ़िल में जान पैदा करना चाहते थे। हसन साहब ग़ज़लसरा हुए। आपको स्टेज से और सामने बैठे हुए सामईन से काफ़ी दाद मिली और नाज़िम ए मुशायरा अपने मक़सद में कामयाब हुए। आपके बाद बारी आई जनाब फ़ैज़ रतलामी की। फ़ैज़ साहब ने दो-तीन क़तए और एक ग़ज़ल के चन्द अशआर पढ़े। स्टेज से दाद न मिलने पर आप नाराज़ भी हुए। अब आवाज़ दी गई जनाब सफ़दर रज़ा को, आप आए, ग़ज़ल सुनाई लेकिन मुशायरे को सहारा न दे सके।

रेग ए सेहरा की जबीं पर ये चमक कैसी है
वो कोई और नहीं पाँव का छाला होगा

तरन्नुम से पढ़ना हरएक के बस की बात नहीं। स्टेज पर बैठे हुए शायर आपस में कानाफूसी कर रहे थे कि इन्हें क्या हो गया? बहरहाल मुशायरा फिर वहीं पहुँच गया जहाँ से शुरू हुआ था। अब मुशायरे को फिर से ज़िन्दगी देने के लिए नाज़िम ए मुशायरा जनाब अंजुम बाराबंकवी को खुद माइक संभालना पड़ा। आपका तरन्नुम बड़ा दिलकश और आवाज़ बड़ी सुरीली है।
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