'हवेली' और उसके मालिक दोनों पर ही फिलहाल उम्र का असर नजर नहीं आ रहा है। हवेली की उम्र है 277 साल और उसके मालिक तो इस लिहाज से 75 साल के जवाँ हैं।
गुलाबी नगरी में 'नवाब साहब की हवेली' के मालिक त्रिलोकीदास खंडेलवाल 75 बरस की उम्र में भी उत्साह और उमंग से भरे हैं। वे 50 फुट ऊँची हवेली की सीढ़ियाँ चढ़कर पर्यटकों को छत पर ले जाते हैं, जहाँ से जयपुर का दिलचस्प नजारा दिखाई देता है। यहाँ से जयपुर का लगभग हर किला और खूबसूरत ऐतिहासिक स्मारक नजर आते हैं।
इस हवेली को जयपुर का दर्पण कहा जाता है, क्योंकि यहाँ से गुलाबी नगरी का पूरा नजारा दिखाई देता है। खंडेलवाल ने बताया कि महाराजा सवाईसिंह के जमाने में विद्याधर भट्टाचार्य ने 1772 में इस हवेली का निर्माण कराया था। तब वे जयपुर के वास्तुकार थे।
इसे भट्टाचार्य का सरकारी निवास बना दिया गया था और महाराजा ने लिखित आदेश दिया था कि उनके परिवार की अंतिम पीढ़ी को भी यहाँ रहने का अधिकार रहेगा। हवेली के निर्माण का एक मकसद यह भी था कि इसकी छत से भट्टाचार्य गुलाबी नगरी में हो रहे निर्माणों पर नजर रख सकें। उनकी चार पीढ़ियाँ यहाँ रहीं। इसके बाद अंतिम पीढ़ी में उनके पड़पोते का कोई पुत्र नहीं था अतः जयपुर रियासत ने हवेली का अधिग्रहण कर लिया था।
और ऐसे नाम पड़ा : अधिग्रहण के बाद हवेली ने अपना आकर्षण खो दिया और कुछ सालों तक वीरान रही। बहरहाल महाराजा रामसिंह (1851-1880) ने यह हवेली उनके दीवान नवाब सर फैज अली खान को तोहफे में दे दी और इस इमारत का नाम नवाब साहब की हवेली पड़ गया।
और दीवान भी गए : खंडेलवाल ने बताया कि सर फैज अली खान के निधन के बाद उनके पुत्र फैयाज अली खान को दीवान बना दिया गया तथा विरासत में उन्हें हवेली भी मिली। उनके निधन के बाद हवेली उनके पोते के नाम हो गई। उनके पोते ने मुफलिसी के दिनों में यह हवेली टुकड़ों में बेच दी और इसका एक बड़ा हिस्सा उन्होंने (खंडेलवाल) खरीद लिया।
नवाबों के वंशजों की होली
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