हृदय रोग उपचार के मामले में भारत ने एक और सफलता अर्जित की है। यह एक डॉक्टर का करिश्मा है, जिन्होंने एंजियोप्लास्टी की नई विधि बनाई है, जिससे इस महँगी शल्यक्रिया को सस्ता बनाया गया है।
यहाँ के डॉ. राहुल पाटिल को इसका श्रेय जाता है। राहुल इसे पेरिफेरल एंजियोप्लास्टी कहते हैं। उनका कहना है कि यह आमतौर पर की जाने वाली शल्यक्रिया से कई मायनों में ज्यादा किफायती है।
इस प्रक्रिया से एंजाइना का दर्द तो खत्म होता ही है, साथ ही हृदय की शिराओं और धमनियों में अवरोध को भी खत्म किया जा सकता है।
यदि वह सामान्य तौर पर किए जाने वाले ऑपरेशन को चुनता है तो उसे काफी पैसा देना होता है और अस्पताल में भी लंबे समय रुकना होता है। 10 दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिलती है और करीब 20 टाँके कम से कम उसे लगाते हैं।
ये है फायदा : डॉ. पाटिल की विधि से की जाने वाली एंजियोप्लास्टी में मरीज को कोई टाँके नहीं आते हैं। उसे अस्पताल में भी दो दिन से ज्यादा नहीं रुकना होता है। इसके अलावा उसकी हालत में तेजी से सुधार होता है और अस्पताल का बिल भी बेहद कम होता है।
नई विधा से एंजियोप्लास्टी करने से खर्च 1,00,000 रु. के करीब आता है। इसमें महज 45 से 90 मिनट का समय लगता है। इसमें बैलून कैथेटर के जरिये रक्त के थक्कों को हटाया जाता है, जिसका चिकित्सकीय नाम है थ्रॉम्बेकटॉमी।
सिंगापुर में हाल ही में आयोजित 17वें वार्षिक सम्मेलन में डॉ. पाटिल ने दुनिया के 10 बड़े हृदय रोग विशेषज्ञ और 500 डॉक्टरों के समक्ष अपनी विधि पेश की।
एंजियोप्लास्टी की नवोन्मेषी तकनीक के लिए उन्हें 'बेस्ट यंग इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट' चुना गया। 46 मामलों में से 9 गंभीर मामले पेश किए गए।
डॉ. पाटिल कहते हैं कि इस पुरस्कार से मेरी विधि को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली है। करीब 9 मरीजों पर इसका प्रयोग किया गया है और यह 100 फीसदी सफल रही।
क्या है थ्रॉम्बेकटॉमी : रक्त का थक्का हटाने की प्रक्रिया को थ्रॉम्बेकटॉमी कहते हैं। रक्त शिराओं और धमनियों में जमने वाले रक्त के थक्कों को दूर करने की यह कारगर विधा है।
किडनी के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है। इसमें अहम भूमिका रहती है बैलून कैथेटर की। इसका एक सिरा गुब्बारानुमा होता है। इसका उपयोग सँकरी हो चुकी शिराओं को खोलने के लिए करते हैं। (नईदुनिया)
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