होली आमतौर पर सिर्फ फाल्गुन के पहले दिन ही खेली जाती है, लेकिन मध्यप्रदेश और खासकर इसके मालवा-निमाड़ क्षेत्र में होली के पाँचवें दिन जो रंग खेला जाता है, उसकी रंगत और जोश देखते ही बनता है।
यहाँ भी मजे की बात यह होती है कि लोग एक-दूसरे को रंग नहीं लगाते, लेकिन सभी सिर से लेकर पैर तक रंगों से सराबोर होते हैं। दरअसल यह कमाल है यहाँ की 'गेर' निकालने की परंपरा का।
प्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर में रंगपंचमी के दिन विशेष तौर पर गेर यानी फागयात्रा निकाली जाती है। यात्रा में टैंकरों में रंगीन पानी भरकर होली के हुल्लड़बाज सड़कों पर निकल पड़ते हैं और फिर जहाँ जो दिखाई देता है, होली के रंग में रंग जाता है। फागयात्रा में पानी की कमी कहीं नहीं रहती। सड़कों के किनारे और छतों पर खड़े लोग बाल्टी भर-भरकर पानी फेंका करते हैं।
त्योहार का नशा इस कदर होता है कि कोई किसी को रंग नहीं लगाता, लेकिन फिर भी हर कोई तरह-तरह के रंगों में सराबोर नजर आता है। रंगों के काफिले में सभी भीगे रहते हैं। गेर में पानी के टैंकर रंगों में घुली तेज बौछारें उड़ाते हुए चलते हैं। इनके साथ हजारों लोगों का काफिला भी चलता है।
गेर का चलन इंदौर में कब से है, इस बारे में अलग-अलग मत जरूर हैं, लेकिन फिर भी इसकी परंपरा सौ साल से ज्यादा पुरानी नहीं है। इंदौर की कपड़ा मिलों के समाट के नाम से ख्यात सर सेठ हुकुमचंद और होलकर साम्राज्य के तत्कालीन महाराजाओं का यह परंपरा शुरू करने में महत्वपूर्ण योगदान रहा।
समाज के कमजोर तबके के लोग कहीं त्योहार की मस्ती से वंचित न रह जाएँ, इसलिए रंगपंचमी पर गेर निकालने का चलन शुरू हुआ था। महाराजाओं और व्यवसायी वर्ग की यह सोच थी कि एक ही क्षेत्र में रह रहे लोग रंगपंचमी के मौके पर एक साथ मौजूद रहें और त्योहार मनाएँ तथा इसमें जात-पाँत या वर्ग की कोई भूमिका न हो। होली मनाने की परंपरा आज भी परिवारों या छोटे समूहों तक सीमित है, लेकिन रंगपंचमी ने मालवा में रंग खेलने की परंपरा को व्यापक रूप दिया है।
इंदौर के कलाकर्मी संजय पटेल कहते हैं यहाँ का मल्हारगंज क्षेत्र सबसे पुराना इलाका है और यहीं से गेर निकलने की परंपरा शुरू हुई थी। गेर निकालने का जिम्मा शहर के कुछ विशेष लोगों के पास रहता था, जिन्हें गिर्री उपनाम से जाना जाता है। इंदौर में बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में बैलगाड़ियों पर गेर निकलती थी। शहर के मुख्य मार्ग से दर्जनों बैलगाड़ियों का काफिला रंग घुले पानी के हौज से फिजाँओं में पानी की बौछार उड़ाता निकलता था।
पटेल ने बताया कि शहर के बढ़ने का असर गेर के आकार और उसकी संख्या पर भी पड़ा। पिछले दो दशक से दर्जनों संगठन रंगपंचमी पर गेर निकालते हैं। प्रत्येक गेर में वाहनों का काफिला होता है जो बौछारें उड़ाते हुए निकलता है। कोई किसी को रंग नहीं लगाता, लेकिन फिर भी सभी रंगे होते हैं।
इंदौर में गेर कई वर्षों तक होलकर महाराजाओं से संरक्षण में निकलती रही। आजादी मिलने के बाद निजी गेर भी निकाली जाने लगीं। शहर के टोरी कॉर्नर और राधाकृष्ण फागयात्रा जैसे संगठनों की गेर इस बार 60वें वर्ष में प्रवेश कर रही है।
शहर के युवा भाजपा नेता लक्ष्मणसिंह गौड़ ने भी दस वर्ष पहले गेर निकालना शुरू की थी। इसमें पानी में घुले प्राकृतिक रंग उड़ाए जाते हैं। यह शहर की ऐसी एकमात्र गेर है, जिसमें महिलाएँ ज्यादा संख्या में भाग लेती हैं। पिछले दिनों प्रदेश शासन में उच्च शिक्षामंत्री रहे गौड़ के निधन के बाद इस बार भी श्रद्धांजलि स्वरूप गेर निकाली जाएगी।
वरिष्ठ मालवी कवि नरहरी पटेल एक कविता 'फागुन तो रंगरेज हठीलो रंग दियो अंग जे चोली के' जरिये कहते हैं कि रंगपंचमी मालवा की एक ऐसी खासियत है, जिसमें फाल्गुन रंगों में भीगकर आता है और सभी को रंग देता है।
उन्होंने बताया कि मालवा में रंगपंचमी वर्षों से सामुदायिक मेल-मिलाप के लिए मनाई जा रही है। मालवी साहित्य में इस त्योहार के लिए राधा और कृष्ण के प्रेम को केंद्र में रखकर कई लोकगीत लिखे गए हैं।
इस बार फाल्गुन की पंचमी दो दिन 26 और 27 मार्च को आ रही है, इसलिए शहर में रंगपंचमी मनाने को लेकर असमंजस की स्थिति जरूर है, लेकिन यह निश्चित है कि इस बार दो दिन शहर की सड़कें रंगों में नहाई दिखाई दे सकती हैं।
फिर बिखरे भगोरिया के रंग भंग की तरंग में नर और नारायण
|