गु़ड़गाँव में रहने वाले सिद्धार्थ ने हाल ही में एक लक्जरी सेगमेंट की कार खरीदी है। उसकी पुरानी कार धुआँ छोड़ने लगी और मैकेनिक ने कहा कि अब यह इसी तरह से चलेगी।
ऐसी स्थिति कई गाड़ियों की है। सिद्धार्थ ने तो नई गाड़ी खरीद ली, लेकिन कई लोग नहीं ले पाते हैं और धुआँ छोड़ने वाली गाड़ी ही चलाते रहते हैं।
देश के सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय के मानकों को यदि लागू कर दिया जाए तो देश में चल रही करीब 60 प्रतिशत कारें बेकार हो जाएँ। मंत्रालय की एक समिति द्वारा बनाए जा रहे मानकों को यदि अक्षरशः लागू किया जाता है तो कई वाहन इस पर खरे नहीं उतरेंगे। स्थिति तब और खराब हो जाती है, जब बड़ी कारों की ओर आदमी आकर्षित होने लगता है। स्पोर्ट्स वाहनों की जहाँ तक बात है तो किसी भी वाहन को ईंधन किफायती नहीं माना जा सकता। ये इनके मानकों पर खरी नहीं उतरतीं।
पिछले कुछ दिनों से सरकार इस बात पर भी विचार कर रही है कि वह पर्यावरण हितैषी कारों पर कर कम करे। साथ ही जो वाहन ईंधन किफायती नहीं हो, उन पर उत्पाद शुल्क को बढ़ाया जाए। इसके अलावा इनका पार्किंग का शुल्क भी बढ़ाया जा सकता है।
सरकार अपनी नई परिवहन नीति के तहत पुरस्कार और दंड जैसे कदम उठा सकती है, जो वाहनों के अनुरूप तय किए जाएँगे। सरकार में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो चाहते हैं कि प्रदूषण फैला रहे वाहनों पर लगातार उत्पाद शुल्क ब़ढ़ाया जाना चाहिए, जबकि जो वाहन ईंधन किफायती हैं, उन पर उत्पाद शुल्क की दरों को कम कर देना चाहिए। (नईदुनिया)
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