देश के कई राज्यों में सड़कों की खस्ता हालत किसी से छिपी नहीं है। इसके लिए अकसर किसी स्थान विशेष की भौगोलिक स्थिति और खराब कंस्ट्रक्शन को जिम्मेदार ठहराया जाता है।
लेकिन अब इसका हल खोज लिया गया है। केरल में प्लास्टिक के कचरे से सड़क बनाने का प्रयोग किया गया है। इससे बनीं सड़कें न सिर्फ टिकाऊ होंगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मददगार साबित होंगी।
कोझिकोड स्थित नेशनल ट्रांसपोर्टेशन प्लानिंग एंड रिसर्च सेंटर (एनएटीपीएसी) ने प्रायोगिक तौर पर वतकारा कस्बे में प्लास्टिक के कचरे से 400 मीटर सड़क तैयार की है।
हालाँकि यह प्रयोग पड़ोसी राज्यों तमिलनाडु समेत कुछ अन्य राज्यों में पहले ही किया जा चुका है, लेकिन केरल की पर्यावरणीय और मिट्टी की भिन्नता के कारण यह प्रयोग सफल नहीं हो सका था। इस पर रिसर्च सेंटर के शोधकर्ताओं ने दोबारा काम शुरू किया और माना जा रहा है कि अब यह प्रयोग सफल हो गया है।
पर्यावरण संरक्षण में मददगार : केरल में प्लास्टिक का कचरा बहुतायत में निकलता है, जिसके निपटान की पूरी व्यवस्था नहीं होने से यह पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदायक साबित हो रहा है। सड़क निर्माण में इस कचरे का उपयोग हो जाने से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया जा सकेगा और साथ ही सस्ती व टिकाऊ सड़क बनाना आसान हो जाएगा।
एनएटीपीएसी के को-ऑर्डिनेटर एन. विजयकुमार कहते हैं कि तिरूवनंतपुरम की हाईवे इंजीनियरिंग लैब में डेढ़ साल तक प्लास्टिक के कचरे से सड़क निर्माण के फार्मूले पर परीक्षण किया गया और अब प्रायोगिक तौर पर सड़क बना भी ली गई है। उम्मीद है प्रयोग सफल रहेगा।
वे कहते हैं कि केरल की जलवायु और मिट्टी में काफी भिन्नता होने के कारण एक फार्मूले को सभी जगह अमल में लाना संभव नहीं था, लेकिन अब सभी जगह के लिए यह प्रयोग सफलतापूर्वक कर लिया गया है।
डामर भी बचेगा : विजयकुमार का कहना है कि प्लास्टिक के कचरे से सड़क बनाने पर 10 प्रतिशत तक डामर की बचत होगी। एक टन प्लास्टिक कचरे से साढ़े तीन मीटर चौड़ी एक किलोमीटर सड़क बनाई जा सकती है। इसमें खर्चा भी पारंपरिक डामर की सड़कों की तुलना में काफी कम आता है।
इस प्रक्रिया में प्लास्टिक के टुकड़ों को पिघलाकर गिट्टी के साथ मिलाया जाता है। इसमें ध्यान रखने वाली बात यह है कि तापमान 160 से 170 डिग्री सेल्सियस के बीच ही होना चाहिए, वरना मिश्रण के चिपकने की क्षमता प्रभावित होती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल भी इस तकनीक को पर्यावरण हितैषी घोषित कर चुका है। (नईदुनिया)
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