रुपहले पर्दे की फिल्म 'अंदाज', 'आन, 'अमन', 'मदर इंडिया', 'दिल देके देखो', 'हम हिन्दुस्तानी', 'एक मुसाफिर एक हसीना' जैसी फिल्में आज भी स्मृतियों को झकझोर देने की क्षमता रखती हैं, लेकिन इन फिल्मों को पर्दे तक लाने वाले स्टूडियो आज अपनी पहचान की तलाश कर रहे हैं।
'फिल्मालय स्टूडियो' के रूपसज्जा संयोजक सुधीर फड़के ने बताया कि बॉलीवुड में आज से दो दशक पहले मुख्यत: फिल्मों की शूटिंग विशेष रूप से तैयार किए गए इन स्टूडियो में ही हुआ करती थी, लेकिन तकनीक और प्रौद्योगिकी के विकास के साथ इन स्टूडियो की रौनक खत्म होती जा रही है।
उन्होंने बताया कि फिल्मालय स्टूडियो की पुरानी इमारत के साथ नया भवन बना है, लेकिन यहाँ बड़ी फिल्मों की शूटिंग लगभग खत्म ही हो गई है, जिससे एक समय गुलजार रहने वाला यह स्थान वीरान-सा नजर आता है।
गौरतलब है कि फिल्मालय स्टूडियो की स्थापना मुखर्जी-समर्थ परिवार ने की थी और यहाँ वर्ष 1959 में 'दिल देके देखो', 1960 में 'हम हिन्दुस्तानी', 'लव इन शिमला', 'एक मुसाफिर एक हसीना' जैसी फिल्में बनाई गईं।
फिल्मालय के सेट में प्रवेश करते ही एक बड़ा-सा हॉल है। दरवाजे के बगल से पहली मंजिल की ओर जाती काठ की सीढ़ी, उसके नीचे किताबों का रैक, ठीक सामने रसोईघर, आगे तीन कमरे और एक तरफ फूलों एवं फव्वारों से युक्त फुलवारी इसे अलग सजीवता प्रदान करते हैं। इस सबके बीच हॉल में एक बड़ी नक्काशीदार मूर्ति है।
स्टूडियो की दीवारों पर अद्भुत नक्काशी और बेजोड़ रंगों के मेल से जो चित्र बनाए गए हैं, वह आज अपनी चमक खोते दिख रहे हैं। स्टूडियो के लम्बे-लम्बे पर्दे पुराने से दिख रहे हैं।
दूसरी ओर 'महबूब स्टूडियो' भी अपनी पुरानी पहचान ढूँढता नजर आ रहा है। महबूब खाँ साहब ने वर्ष 1954 में इस स्टूडियो की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य निर्माण जरूरतों को पूरा करना और बॉलीवुड में शूटिंग के लिए स्थान मुहैया कराना था।
यह स्टूडियो लगभग 20 हजार वर्गफीट में फैला हुआ है, जहाँ अंदाज 'आन', 'अमन', 'आवाज', 'पैसा ही पैसा', 'मदर इंडिया' जैसी फिल्मों की शूटिंग हुई, लेकिन महबूब खाँ के 1964 में निधन के बाद उनकी विरासत संभालने में कोई सफल नहीं हुआ।
महबूब खान का पूरा परिवार इसी स्टूडियो परिसर में निवास करता है, जिसमें उनके पुत्र अयूब इकबाल और शौकत शामिल हैं, जबकि शेष बचे स्टेज और हॉल निजी प्रोडक्शन हाउसों को किराए पर दे दिए गए हैं।
महबूब स्टूडियो में काम करने वाले एक कर्मचारी ने बताया कि इस स्टूडियो में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान वर्ष 2000 में आग भी लग गई थी। महबूब खान की मौत के बाद परिवार कर्ज में डूब गया था, जिसके कारण भी इसका रखरखाव ठीक तरह से नहीं किया जा सका।
इन स्टूडियो में काम करने वाले कर्मचारियों का कहना है कि हाल के दिनों में टेलीविजन धारावाहिकों के निर्माण में तेजी आने से यहाँ कामकाज और शूटिंग में तेजी आई है, लेकिन अभी भी इन स्टूडियो को पुरानी रौनक की तलाश है।
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