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हजारों बच्चों की तस्करी हो रही है बंगाल से
एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ने दावा किया है कि अच्छी नौकरी दिलाने और शादी कराने का प्रलोभन देकर पश्चिम बंगाल के सात जिलों से हजारों बच्चों और विशेषकर लड़कियों की तस्करी की जा रही है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों का हवाला देते हुए एनजीओ 'सेव दि चिल्ड्रन' ने कहा कि अधिकतर बच्चों को तस्करी के जरिये मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरू, जयपुर और जालंधर सहित हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार के अन्य उत्तरी शहरों में भेजा जाता है।

ये बच्चे असुरक्षित परिस्थितियों में कार्य करते हैं। इन्हें कम खाना दिया जाता है, पीटा जाता है, यौन उत्पीड़न किया जाता है और जानबूझकर जलाया जाता है।

चार वर्ष के समय में किए गए अध्ययन पश्चिम बंगाल में लापता बच्चों के मुताबिक पाथरप्रतिमा के दक्षिणी क्षेत्र से वर्ष 2005 से 71 बच्चे लापता थे। इनमें से 28 बच्चों को छुड़ा लिया गया।

इसी तरह संदेशखली से वर्ष 2004 से 2006 के बीच 302 बच्चे लापता हुए थे। इनमें से 30 बच्चों का ही पता लगाया जा सका।

अध्ययन के अनुसार संदेशखली और पत्थरप्रतिमा के आँकड़े पश्चिम बंगाल से लापता हो रहे बच्चों की बढ़ती संख्या का संकेत देते हैं।

एनजीओ का कहना है घरेलू कामकाजी बच्चों में अधिकतर गरीब परिवारों से आने वाली लड़कियाँ होती हैं। बिना अंतराल दिए एक दिन में इनसे 15 घंटे काम लिया जाता है और एवज में काफी कम भुगतान किया जाता है।

अध्ययन में कहा गया है कि 68 फीसदी बच्चे शारीरिक उत्पीड़न का सामना करते हैं और 46.6 फीसदी का गंभीर रूप से उत्पीड़न किया जाता है जिससे वे जख्मी हो जाते हैं। 32.2 फीसदी बच्चों का यौन शोषण किया जाता है और 20 फीसदी पर यौन संबंध स्थापित करने के लिए दबाव डाला जाता है।

पचास फीसदी बच्चों को साल में कोई छुट्टी नहीं दी जाती। 37 फीसदी बच्चे कभी अपने परिवार से नहीं मिल पाते और 78 फीसदी बच्चों को 500 रुपए प्रतिमाह से भी कम भुगतान किया जाता है।

लापता हुए कुल बच्चों में 66.6 फीसदी लड़कियाँ होती हैं। 49 फीसदी बच्चे 15 से 18 वर्ष, 30 फीसदी बच्चे 13 से 14 वर्ष और 21 फीसदी बच्चे 12 वर्ष से भी कम आयु समूह के होते हैं। इनमें से 15.04 फीसदी बच्चे कभी स्कूल नहीं गए हैं।

लापता हुए सिर्फ 16 फीसदी बच्चों के मामले ही पुलिस या पंचायत में दर्ज हो पाते हैं। शेष 84 फीसदी मामलों में माता-पिता स्वयं या अपने संपर्कों के जरिये बच्चों के बारे में जानकारी इकट्ठा करते हैं।

अध्ययन कहता है सातों जिलों के हर गाँव से बहुत से बच्चे काम की तलाश में बाहर जाते हैं। इनमें से उन बच्चों की संख्या गंभीर है जो कभी वापस ही नहीं लौट पाते।

अध्ययन में उत्तर प्रदेश में हुए निठारी कांड का उल्लेख करते हुए महिला एवं बाल विकास विभाग के हवाले कहा गया है कि इससे प्रशासनिक व्यवस्था की उदासीनता दिखाई देती है। इसमें विशेषकर पुलिस की बच्चों की समस्याओं से निपटने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रति उदासीनता दिखाई देती है।
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