अमेरिका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी से लोक स्वास्थ्य में स्नातकोत्तर की डिग्री लेने वाली रानी बंग अपने देस क्या आईं, गाँव की जान बन गईं। ग्रामीणों के स्वास्थ्य की मशाल थामी और आज महाराष्ट्र के आदिवासी जिले ग़ढ़चिरोली में उन्होंने शिशु मृत्यु दर को एक तरह से थाम लिया है। टाइम पत्रिका ने उन पर पहले ही एक विशेष आलेख निकाला है।
महिला दिवस के मौके पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उन्हें महिला विकास की दिशा में काम करने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा। उन्होंने विज्ञान प्रौद्योगिकी की मदद से पिछ़ड़ेपन पर जीत हासिल की। रानी के साथ उनके पति अभय भी हैं, वे भी जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर किए हुए हैं।
रानी और उनके पति ने ग्रामीण महिलाओं को सामुदायिक स्वास्थ्य के बारे में सिखाया। यहाँ पर शिशु मृत्यु दर को 75 फीसदी तक कम कर दिया। 22 साल पहले दोनों ने काम करना शुरू किया था। तब हालत यह थी कि नवजात प्रति 1000 बच्चों में से 121 बच ही नहीं पाते थे।
अब स्थिति यह है कि केवल 30 को नहीं बचाया जा पाता। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल का कहना है कि श्रीमती रानी बंग ने आदर्शवाद, सामाजिक सेवा और वैज्ञानिक अनुसंधान का साथ मिलाकर समाज की सेवा की है और मिसाल पेश की है।
महिलाओं को बेहतर जीवन स्थितियाँ देने में उनका योगदान उल्लेखनीय है। स्त्री रोग विशेषज्ञ और वैज्ञानिक होने के साथ-साथ उन्होंने समाज सेवा भी की है। अमेरिका से लौटने के बाद जब उन्होंने देखा कि हालत सुधारना होगी तो उन्होंने 1986 में सोसायटी फॉर एजुकेशन, एक्शन एंड रिसर्च शुरू किया।
ये करते हैं दोनों पति-पत्नी साथ रहते हैं और वहाँ रहने वालों की मदद से करीब 150 गाँवों में काम करते हैं। इसमें वे लोगों को सामुदायिक स्वास्थ्य रक्षा की जानकारी देने के साथ-साथ शोध भी करते हैं। उन्होंने वहाँ पर ख्यात सामुदायिक स्वास्थ्य व शोध केंद्र- शोधग्राम के नाम से चला रखा है। सम्मानित होने पर वे कहती हैं कि यह उन महिलाओं के काम को मिली मान्यता है, जो उनके साथ हैं। वे ग्रामीण महिलाओं को प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में प्रशिक्षण देती हैं।
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